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है कोई बजरंगी भाईजान जो बचा ले मासूम को रेपिस्ट से

है कोई बजरंगी भाईजान ! हाँ अब तो बजरंगी भाईजान की तलाश होनी चाहिए जब सुनने मे आ जाए कि 5 साल की मासूम बच्ची का रेप हो गया। तब वो दृश्य याद आता है कि बजरंगी भाईजान एक एक को उठाकर पटक देता है और गूंगी बच्ची को वैश्यालय से बचाकर वापस ले आता है। वहाँ सबकुछ तहस नहस हो चुका होता है लेकिन एक मासूम की जिंदगी बरबाद होने से बच जाती है।

वो दृश्य हमारे ही समाज के दो हिस्से को स्पष्ट बता देता है कि इसी समाज मे जिस्म का सौदा करने वाले और लूटने वाले हैं, कोई जंगल का भेड़िया और शेर आकर कभी रेपिस्ट नहीं बनता। जब ऐसी खबरें पढ़ी और सुनी जाती है तो मानो अब आम बात हो चुकी है। प्रतिक्रिया भी दें तो क्या दें ? स्तब्ध सा रह जाना होता है और सोचना पड़ता है कि आखिर रेप और रेपिस्ट की समस्या का हल क्या है ?

इस बीमार मानसिकता का अंत कब और कैसे होगा ? ये चिंतन का विषय है। साथ ही समाज के कर्ताधर्ताओं को जिम्मेदारी प्रमुखता से उठानी होगी और कुछ नए लोगों को आगे आना होगा। धर्मशास्त्र आदि के प्रवचन के साथ आदमी की उदासीनता को दूर करने के लिए भारत के गांव गली तक जन जागरूकता अभियान की महती आवश्यकता महसूस होती है। जिसमे जन संवाद होना चाहिए।

अब लोगों के पास वक्त नहीं रह गया तो वहीं मानसिकता को विकृत करने हेतु बाजारवाद के दौर मे वूमेन प्रोडक्ट के रूप मे अवतरित है तो साइलेंट जोन से बाॅडी बिल्डर मैन प्रोडक्ट भी मौजूद है। कहा ना कि दोनो पक्ष देखने ही होगें।

जब हम पर बीतती है तब बहुत पीड़ा होती है लेकिन पड़ोसी पर बीतती है, तो आवश्यक नहीं कि दर्द हो। ऐसी संकुचित सोच और हमारी उदासीनता ही सामाजिक सामूहिक बरबादी का प्रमाण है। हमारे समाज मे अब मासूमों का रेप और मर्डर होने लगा है, जनसामान्य की साधारण से साधारण समस्या जस की तस हैं फिर भी हम कट्टरता और छद्म उदारवाद का शिकार हो जाते हैं। हमारे देश की राजनीति ही दूषित हो चुकी है। हम सिर्फ मानवता की बांग देते हैं जबकि मन और मानवता के हित मे कुछ काम सामाजिक राजनीतिक रूप से होता ही नहीं है।

जबकि आस्ट्रेलिया जैसी जमीं से मानवता की बेमिसाल प्राथमिकता वाली खबरें मिल जाती हैं। विदेशी धरती पर कितने भी चांद सरीखे दाग दिख जाएं परंतु मन और मानवता पर उनका अपना शोध है। जिस पर मानव जीवन चलता है। लेकिन एक हमारा देश है, जहाँ शिक्षा संस्कृति और मान मर्यादा की बांग तो खूब दी जाती है, शूरता वीरता का पाठ खूब पढ़ाया जाता है पर क्या कभी ऐसी खबर मिली कि एक मासूम बच्ची का रेप होने से फला बजरंगी भाईजान ने बचा लिया है ?

चिंतन करिए कि आखिर हम किस ओर जा रहे हैं ? हमे कहाँ जाना था और कहाँ पहुंच चुके हैं। आजादी के पहले और आजादी के बाद से भारत मानसिक अवसाद मे कैसे और कितना ग्रस्त हुआ इसका कोई पैमाना किसी के पास अवश्य नहीं, किन्तु कड़वा सच है कि अवसादग्रस्त है भारत।

कहते हैं कि पागल "पागलखाने" मे रहते हैं। भारत मे आगरा और ग्वालियर का पागलखाना बहुत फेमस है, किन्तु प्रतीत हो रहा है कि घर और सड़क पर बुद्धिजीवी, सभ्य कहलाने वाले नाना प्रकार के हम लोग सड़क पर घूमते हुए उन पागलों से बत्तर स्थिति के पागल हैं जो स्वयं को शरेख कहते हैं, किन्तु हकीकत मे पागलों से बुरी स्थिति है हमारी कि कुछ चंद लोग देश और समाज को लूट खसोट रहे हैं और हम शेखी बघारते रहते हैं।

सचमुच हम बड़े शेखू हैं, इस शेखपने मे जीते रहिए। देश के कोने कोने मे पहले भी और आज भी हाहाकार मचा है, कुछ मदारी जनता को बंदरिया की भांति नचा रहे हैं और शरेख जनता नाच रही है क्योंकि हम सभ्य हैं ?

सुनो
हमसे भले तो
वो पागल हैं
जिन्होंने इस दुनिया को छोड़कर

अपनी दुनिया अपना ली
उन पागलों के रहने लायक
ये दुनिया थी ही नहीं !

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