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जो अपने आचरण से सिखाता है वह आचार्य-संजय श्रीहर्षजी

जो अपने आचरण से समाज को सिखाता है। वह सही मायने में आचार्य है। यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कानपुर प्रांत के प्रांत प्रचारक संजय श्रीहर्ष ने व्यक्त किए। वह आज स्थानीय सिटी सेंटर के सभागार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं विभिन्न अनुषांगिक संगठनों की ओर से आयोजित राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की भूमिका विषयक संगोष्ठी को मुख्य वक्ता के रुप में मौजूद बुद्धिजीवी स्वयंसेवकों को संबोधित कर रहे थे।

प्रांत प्रचारक श्री संजय ने काशी के एक शिक्षक की घटना का उदाहरण देते हुए बताया कि एक शिक्षक कक्षा में उदास थे लेकिन पढ़ रहे थे, तब छात्रों ने शिक्षक से पूछा कि आज मोहन क्यों नहीं आया। वे चुप रहे। जब पीरियड समाप्त हुआ तो छात्र उनके पास गए और उनके पुत्र तथा छात्र मोहन के आज कक्षा में न आने का कारण पूछा तो शिक्षक ने कहा कि मोहन को आज सांप ने काट लिया, उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मां बेटे के शव के पास बैठी है।

इस पर जब छात्रों ने पूछा कि आप आज पढ़ाने कैसे आ गए तो शिक्षक ने कहा कि पढ़ाना मेरा राष्ट्रीय कर्तव्य है। जबकि बेटेे का क्रियाकर्म मेरा निजी दायित्व है। इस तरह का आचरण रखने वाले शिक्षक की आज कमी होती जा रही है क्योंकि समाज ने अच्छा दायित्व निभाना छोड़ दिया है। आज समाज नामक व्यवस्था शून्य हो गई है। इसी कारण हर क्षेत्र में गिरावट महसूस हो रही है। उन्होंने कहा कि शिक्षक कभी सेवानिवृत्त नहीं होता है। उसे आजीवन शिक्षक का भाव अपने भीतर रखना चाहिए। उसे सोचना चाहिए कि वह छात्र-छात्राओं व देश का भविष्य व भाज्य निर्माता है। जब वह अपनी इस महती भूमिका पर विचार करेगा तो उसके मन में अवकाश प्राप्त होने जैसा भाव नहीं आएगा।

इसके पूर्व विषय प्रवर्तन करते हुए कहते हुए डीवी कालेज के प्राचार्य डा. राजेश चंद्र पांडेय ने कहा कि आज दो तरह के शिक्षक होते है। एक शिलाचारी और दूसरे आकाशाचारी। शिलाचारी एक शिला की तरह एक शिक्षक और शिष्य छात्र को दूबाघास समझता है और अपने आत्मबल पर शिला के नीचे उगती है। जबकि दूसरे आकाशचारी शिक्षक ऐसे होते है जो चाहते है कि मैंने अपने शिष्य को जो ज्ञान दिया है। उससे उनका नाम व यश पूरी दुनिया में फैले। आज ऐसे शिक्षकों की राष्ट्र को पुनः आवश्यकता है।

संघ के अनुषांगिक संगठन इतिहास संकलन समिति के प्रदेश संयोजक  डा. प्रयाग नारायण त्रिपाठी ने आज देश को पुनः धर्म आधारित, भारतीय संस्कृति आधारित शिक्षा जिसमें हम वसुधैव कुटंबकम की बात सिर्फ मानते ही नहीं बल्कि जीते थे। उन मू्ल्यों पर आधारित शिक्षा की जरूरत है।

संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे डीवी कालेज की राजनीति विज्ञान के पूर्व विभागाध्यक्ष डा. राजेंद्र पुरवार ने कहा कि राष्ट्र का निर्माण उसकी भविष्य उसकी शिक्षा नीति है। शिक्षकों का शिक्षा के प्रति जो समर्पण भाव था। उसका परिणाम था कि अंग्रेजों की गुलाम ने जो हमें लार्ड मैकाले की शिक्षा नीति दी। उसने भी हमारे देश में लोकमान्य तिलक, सुभाष चंद्र बोस, जयप्रकाश नारायण, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, डा. राममनोहर लोहिया जैसे निष्कंलक राजनेता और समाजचिंतक दिए है। इसका अर्थ है कि यदि शिक्षक अपने छात्र-छात्राओं का, पुत्र-पुत्रियों के समान शिक्षा देगा तो भारत को परम वैभव के शिखर पर पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता है।

इस अवसर पर जिला संघचालक संतोष त्रिपाठी, सह प्रांत कार्यवाह अनिल जी, विभाग कार्यवाह ओमनारायण, प्रांत प्रचार प्रमुख अनूप जी, जिला प्रचारक पीयूष जी, भूपेश, इतिहासकार डीके सिंह, प्रोफेसर डा. रविकांत द्विवेदी, भाजपा सांसद भानुप्रताप वर्मा, भाजपा के माधौगढ़ विधायक मूलचंद्र निरंजन, भाजपा नेता अवध शर्मा बब्बा, रामेश्वर प्रसाद त्रिपाठी, राजेंद्र सिंह निरंजन, अश्वनी पुरवार, कीर्ति दीक्षित, रमेश भटनागर सहित सैंकड़ों गणमान्य लोग मौजूद थे। इसके पूर्व गणेश त्रिपाठी गणगीत प्रस्तुत किया। जबकि संचालन पराग शर्मा एवं आशीष तिवारी ने संयुक्त रुप से किया।



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