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राजनीति और पत्रकारिता हत्या पर नहीं जीवन पर हो

मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है किसी की हत्या को आज आप जायज ठहरा रहे, कल अपनी हत्या को जायज ठहराए जाने की वजह दिए जा रहे हो। हत्या करना एक घृणित कृत्य है। हत्या की वजह कुछ भी हो लेकिन जब तक वह आतंक के रास्ते पर या फिर बासबूत देशद्रोही कृत्य नहीं किए हो, उसकी हत्या को जायज ठहराना अपनी आत्मा को मृत बता देना है।

वामपंथी हो या दक्षिणपंथी प्रमुखता जीवन को ही देना होगा। काग्रेसी हो या भाजपाई जो भी अपराध करे उस अपराधी के खिलाफ खड़े होइए नाकि अपराध के पक्ष मे इससे अनजाने मे आप हत्या जैसे घृणित अपराध को प्रोत्साहन प्रदान कर रहे हैं। मुझे नहीं पता कि गौरी लंकेश कामरेड है या देशद्रोही है अथवा उसने कब और कितने देश के विरूद्ध षडयंत्र रचे बल्कि इतना जानता हूं कि न्यायपालिका पर भरोसा करते हैं तो उसके दोष वहीं सिद्ध करने चाहिए थे। न्यायपालिका और लोकतंत्र मे सबको उचित न्याय व समानता मिलती है।

इस पूरे प्रकरण मे कांग्रेस फिर से नग्न हो चुकी है कि राज्य मे सरकार आपकी है। कानून व्यवस्था और सुरक्षा की जिम्मेदारी आपकी है, कभी आपने ही राम रहीम को z+ सुरक्षा दी और जब आपको महसूस होता था कि सच की देवी गौरी की जान को खतरा हो सकता है। आखिर जेड श्रेणी की सुरक्षा क्यों ना दी ?

कहा यह भी जा रहा है कि इसमे कांग्रेस के बड़े नेता का हाथ हैं जिनकी गौरी से काफी तनातनी चल रही थी। अपराध आपके आंगन मे हुआ और बदनाम संघ को करें ? केरल मे संघ के स्वयंसेवक की हत्या पर कांग्रेस या वामपंथ ने दुख क्यों ना जताया ? कट्टरपंथी के खिलाफ लड़ रही थीं तो फिर लड़ने वालों को मौत भी नसीब हो तो उसे शहीद कहते हैं और ऐसी शहादत पर राजनीति क्यों ? मायने ये नहीं रखता कि पत्रकार है, संघ और तमाम संगठन का सदस्य है अथवा आम आदमी सबका जीवन मूल्य एक समान होना चाहिए। यहाँ लोग मर रहे हैं उनके घर परिवार के हित का ख्याल किसी को नहीं है, उन्हे मुआवजा कौन और कितना देगा ?

सरहद पार एक ड्रैगन जरूर है लेकिन हमारे घर मे ही इतने राजनीतिक ड्रैगन है जो भारत और भारतीयता को लील जाना चाहते हैं। आइए जीवन मूल्य पर बात करें, हम सब एक दूसरे के सहयोगी बने और जनता ऐसे गिरोह से उचित दूरी बना ले जिनकी आत्मा मर चुकी है।

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