< स्वाधीनता संग्राम में राव महीपत निधि थी पहली शहादत Hindi News - Breaking News, Latest News in Hindi, हिंदी में समाचार, Samachar - Bundelkhand News महोबा जिले की सबसे छोटी रियाशत सुगिरा के राव महीपत सि"/>

स्वाधीनता संग्राम में राव महीपत निधि थी पहली शहादत

महोबा जिले की सबसे छोटी रियाशत सुगिरा के राव महीपत सिंह ने स्वाधीनता आन्दोलन में अपना बलिदान दे पहली आहूति दी थी। अंग्रेजों के जुर्म के खिलाफ बगावत कर उन्होने यहां के तत्कालीन कलेक्टर कार्नो को सबक सिखाने के लिये झांसी की रानी लक्ष्मी बाई व बिठूर नरेश तात्या टोपे से सहयोग मांगा। राव महीपत सिंह की अगुवाई में इन युद्धवीरों की संयुक्त सेना ने अंग्रेजी फौजों को खदेडा तो फिरंगी हुकूमत के चुनिन्दा अधिकारियों व कलेक्ट्रेट कार्नो ने चरखारी के राजा रतन सिंह के महल में शरण ली।

स्वदेशी सेना ने चरखारी के मंगलगढ दुर्ग को घेर रतन सिंह को कार्नो को बाहर निकालने के लिये ललकारा। पर तभी झांसी से खबर आई कि अंग्रेज सेना ने आक्रमण कर दिया है। इस पर रानी लक्ष्मी बाई व तात्या टोपे को लौटना पडा। अकेले पड गये राव महीपत को चरखारी नरेश ने धोखा देकर महल में बुला कार्नो के हवाले कर दिया। बाद में उन्हें बांदा के भूरागढ़ किले में फांसी पर लटका दिया गया। इस तरह देश के इतिहास में आजादी के लिये खुद का बलिदान करने वाले राव महीपत पहले शहीद बने।

वाक्या 1857 का है गदर के बाद पूरे देश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ युद्ध सा माहौल था। तमाम बुन्देली रियाशतों व रजवाडों के सिपहसालारों ने सूपा गांव में एक पंचायत कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंकने का संकल्प लिया। रजवाडों से उठी इस आवाज को गांव गली के वीर बुन्देलों का पूरा समर्थन मिला और हर जगह फिरंगियों व उनके कारिन्दों का मुखर विरोध शुरु हो गया। इसे दवाने के लिये महोबा में अंग्रेजी हुकूमत की ओर से नियुक्त तत्कालीन कलेक्टर कार्नो ने जगह-जगह लाठी चार्ज कराया।

जिसमें सैकडों स्वतन्त्रता सेनानी गम्भीर रुप से घायल हुये। सुगिरा के राव महीपत सिंह को बुन्देलों के साथ हुआ यह जुर्म बर्दाश्त नही हुआ तो उन्होने फिरंगी कलेक्टर को सबक सिखाने के लिये झांसी की रानी लक्ष्मी बाई व बिठूर नरेश तात्या तोपे से सहायता मांगी। दोनों अपनी सेना के साथ सुगिरा पहुंच गये। इसकी भनक लगते ही कलेक्टर कार्नो ने चरखारी नरेश रतन सिंह की शरण ली।

राव महीपत ने झांसी और बिठूर की सेना के साथ चरखारी का मंगलगढ दुर्ग घेर रतन सिंह को कार्नो को बाहर निकालने के लिये ललकारा। देशी सेना और अंग्रेजी हुकूमत के बीचयुद्ध चल ही रहा था कि झांसी से आये एक हलकारे ने रानी लक्ष्मी बाई को खबर दी कि अंग्रेजों ने उनका किला घेर लिया है। खबर मिलते ही तात्या तोपे और लक्ष्मी बाई अपनी सेना के साथ झांसी कूच कर गई। इससे राव महीपत अकेले पड गये। उधर चरखारी नरेश रतन सिंह ने कार्नो को महिला के वेश में बाहर निकाल बांदा के नवावों के यहां भेज दिया।

बाद में चरखारी के राजा रतन सिंह ने राव महीपत सिंह को विश्वास में ले कार्नो को उनके हवाले करने का झांसा दे, धोखा देकर उन्हें गिरफ्तार करा कलेक्टर कार्नो को सौंप दिया। एक माह तक उन्हें पन्ना के किले में रखा गया। बाद में बांदा के भूरागढ किले में आजादी के इस दीवाने को फांसी पर लटका दिया गया। इस तरह बुन्देलखण्ड की सबसे छोटी रियाशत सुगिरा के राव महीपत सिंह आजादी के आन्दोलन में अपनी आहूति देने वाले पहले शहीद बने।

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