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आल्हा ऊदल की वीरता का आज भी कायल है बुंदेलखंड

सुमेरपुर क्षेत्र के दर्जनों गांवों में कजली उत्सव यानि बुंदेलखंड का विजयोत्सव परम्परागत तरीके से मनाया गया। सावन गीतो के कजलियां निकाली गयी बहनों ने भाईयों के रक्षासूत्र भी बांधे। बिदोखर में आल्हा गायन का शानदान आयोजन हुआ जिसमें कीरत सागर का लडाई लोग चाव पूर्वक सुनते रहे। बिदोखर में देवी मंदिरों में आयोजित आल्हा गायन के कार्य्रम में युवा आल्हा गायन दिनेश सिंह ने बताया कि बुंदेलखंड का कजली उत्सव एक परम्परागत धार्मिक, सामाजिक उत्सव ही नही बल्कि इसके साथ बुंदेलखंड की आन बान शान की रक्षा हेतु आल्हा-ऊदल की वीरता व पृथ्वीराज चैहान के विरुद्ध सभी वीरों द्वारा हथियार उठाने व अपनी लाज बचाने की स्मृतियां भी जुड़ी है।

कीरत सागर की लड़ाई जो राजा परमाल की पुत्री चन्द्रावलि के कारण खास रक्षाबंधन के दिन हुई थी। उसी का वर्णन आल्हा गायन में किया गया। पूर्व प्रधान रणविजय सिंह ने पृथ्वीराज की लड़ाई प्रस्तुत की तो दिनेश सिंह ने पृथ्वीराज व आल्हा-ऊदल के बीच हुये भीषण युद्ध का वर्णन किया। श्रोता के रूप में उपस्थित कई गांव के लोग वाह-वाह कहकर गायकों का उत्साह बढ़ाते रहे। दुबारी विश्वकर्मा ने भी आल्हा गायन प्रस्तुत किया।

आल्हा गायन के पूर्व रोहरी, पाटनपुर, बण्डा, मवईजार, इंगोहटा, बिदोखर में कजरियां भी निकाली गयी। समूह के साथ सावन गीतों के साथ महिलाएं तालाबों मेें गयी और वही पर कजलियां विसर्जित की। इस तरह बुंदेलखंड का विजय उत्सव सुमेरपुर क्षेत्र में दर्जनों गांवों में परम्परागत ढंग से मनाया गया।

अब पहले जैसा नही रहा कजली उत्सव
हमीरपुर/08 अगस्त 2017/महोबा में रक्षाबंधन के दिन चन्द्रावलि का डोला ले जाने के प्रयास में जो अवरोध उत्पन्न हुआ था उसके कारण अगले दिन विजय दिवस के रूप में मनाया जाने वाला कजली उत्सव पहले कुछ और था अब सिर्फ रस्म अदायगी तक सिमट गया है। बिदोखर के रणधीर सिंह बताते है कि पहले गांव-गांव इस उत्सव में दंगल के आयोजन होते थे। मेले लगते थे। पेड़ों में झूले पड़ते थे। महिलाओं द्वारा तालाबो के किनारे जहां भुजरियां विसर्जित की जाती थी वहां नाज गाने होते थे।

मगर दो दशक से यह उत्सव भी फीका होता चला आ रहा है अब बहुत कम स्थानों पर दंगल के आयोजन होते है मेला भी नही लगते। ग्राम बिदोखर में जहां चर्चित आल्हा गायक चन्द्रभान सिंह व जयसिंह ने हमेशा आल्हा प्रस्तुत किया वही अब उनके पुत्र आल्हा गायन प्रति वर्ष कर रहे है। इसीलिये वहां का कजली उत्सव अपनी पहचान कायम किये है।

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