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मामा के बयान से योगी सरकार की बढ़ी चिंता

राजनीतिक इच्छाशक्ति से क्या कुछ नहीं हो जाता है, इसका ताजा तरीन उदाहरण मध्यप्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान के इस बयान से महसूस होता है कि अब मध्यप्रदेश में डकैत रहेगें या शिवराज ?

मामा ने इतना कहा ही था कि पुलिस की सक्रियता से दस्यू ललित पटेल ढेर हो चुका है। सतना एसपी ने इसकी पुष्टि की है कि दस्यू ललित पटेल मुठभेड़ में मार गिराया गया है।
बुंदेलखण्ड वह भाग है जो मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों में संयुक्त रूप से आता है। आजादी के कुछ समय बाद से ही यहाँ दस्युओं का आतंक इस कदर बरपता रहा कि अपार खनिज संपदा होने के बावजूद विकास असंभावी हो गया। व्यापारियों का रूझान इस ओर कभी हो नहीं सका। यहाँ तक की सरकारी कार्यों के विकास में भी डकैतों के चढउना के बगैर कभी कोई कार्य सम्पन्न नहीं हो सका है।

सच्चाई यहाँ तक है कि तमाम निर्माण कार्य सिर्फ कागजों पर हुए हैं। डकैतों के भय से विभागीय अधिकारी निर्माण कार्यों की संतुति कागजों पर कर चुके हैं पर हकीकत की बानगी कहती है कि या तो वे अधूरे पड़े हैं या फिर कहीं कुछ हुआ ही नहीं और धनराशि का बंदरबांट हो चुका है।

बुंदेलखण्ड के यूपी इलाके के चित्रकूट के पाठा क्षेत्र में दस्युओं का आतंक सर चढ़कर आज भी बोल रहा है।

कुछ महीने से आतंक इतना बढ़ चुका था कि स्कूल के शिक्षक तक महफूज नहीं रह गए। एक शिक्षक का पिछले दिनों अपहरण कर लिया गया था। बाद में एनकेन प्रकारेण डकैतों की गिरफ्त से छूटे तो लेकिन मन में व्याप्त भय शायद ही निकल पाया हो।

हाल ही में डकैत बबली कोल द्वारा सपा नेता संतू सिंह के भाई विजय सिंह व रेलवे गेटकीपर का अपहरण कर सनसनी मचा दी थी। फिरौती की रकम 50 लाख मांगी गई। अंततः सामाजिक दबाव तथा पुलिसिया दबाव के संयुक्त प्रयास से दोनों को आजादी मिल सकी थी। फिर भी दस्यु बबली कोल का अंत अब भी नामुमकिन प्रतीत होता है। सूबे की सरकार के लिए सिर दर्द बने हुए इस डकैत के सफाए के लिए पुलिस की गोली में अभी वह दम महसूस नहीं हुआ। सरकार के पास उस दवा की कमी प्रतीत हो रही है। जिससे बबली कोल को मुंह की खानी पड़े।

हालांकि एसटीएफ दस्यू गोप्पा को गिरफ्तार करने में कामयाब रही थी। किवदंती यह है कि वह नाटकीय समर्पण था। बिरादरी के आला अफसर पर सामाजिक चर्चा है कि अफसरशाही की जातिवादी सोच की वजह से दस्यू गोप्पा का जो अंजाम होना चाहिए था वह ना करके नाटकीय समर्पण कराकर एक दिन नेता बनाने के लिए पेश किया गया है। ये सच है कि तमाम दस्युओं का यही एक सपना रहता कि जंगल से भय कायम करके एक दिन समर्पण के द्वारा नेता बनने में कामयाब हो जाओ।

इसका ताजा तरीन उदाहरण एक दस्यू परिवार के परिजनों का माननीय नेता के रूप में जाना जाना इस बात की पुष्टि करता है कि कभी गोप्पा "नेता जी" कहला सकते हैं। गोप्पा के समर्पण की सीआईडी जांच हो जाए तो बात स्पष्ट हो सकती है।

हाल फिलहाल मामा के बयान और पुलिस के एक्शन से योगी सरकार के लिए चिंता का विषय है। चिरयुवा योगी आदित्यनाथ क्या मामा शिवराज की तर्ज पर कह पायेगें कि उत्तर प्रदेश के बुंदेलखण्ड में डकैत रहेगें या योगी ? महज यह सवाल नहीं बल्कि शासन प्रशासन का कर्तव्य है कि भयमुक्त समाज दें। भाजपा का नारा भी था कि ना गुण्डाराज ना भ्रष्टाचार अबकी बार भाजपा सरकार। इसलिये यूपी के सीएम को मामा की तर्ज पर सख्ती बरतनी होगी। हालांकि मध्यप्रदेश के चुनाव करीब हैं तो लोकसभा चुनाव भी दरवाजा खटखटा रहे हैं। इसलिये उत्तर प्रदेश सरकार को बुंदेलखण्ड के विकास के लिए सर्वप्रथम डकैतों का सफाया करना होगा।

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