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फिर आ गया चोटी काटने वाला मुंहनुचवा

देश के कोने कोने से कुछ महिलाएं, बेटियां कह रही हैं कि कोई आता है और चोटी काट ले जाता है। चोटी काटने की प्रथम घटना 25 जून को राजस्थान के जोधपुर में घटित हुई। उस वक्त एक महिला घर से कुछ काम के लिए जैसे ही बाहर निकली वैसे ही बतौर महिला के कि कोई आया और पीछे से धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया। होश में आते ही महिला के परिजनों से पता चलता है कि उसकी चोटी कट गई।

राजस्थान में घटित इस प्रथम घटना के बाद से आबोहवा दिल्ली, गुरूग्राम, हरियाणा, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैल गई। इसके बाद से इन राज्यों से भी चोटी कटने की घटना सामने आई।

मामला उस वक्त संगीन हो गया जब एक लगभग 10 साल की मासूम बेटी ने कहा कि कोई रात को आया और उसकी चोटी काट ले गया। चोटी काटने की घटना ज्यादातर रात को घटित हुई। प्रायः अशिक्षित समाज में इस घटना का भी वैसा ही जोर रहा जैसे सामान्यतया तमाम प्रकार की ऐसी घटनाएं देश में घटित हो चुकी हैं।
उत्तर प्रदेश के आगरा में एक बुजुर्ग महिला को भीड़ ने चोटी काटने वाली समझकर मौत की नींद सुला दिया। एक बेटे ने अपनी माँ को खो दिया। परिजन बिलखते रहे। चोटी काण्ड की चर्चा यहाँ से थमी नहीं बल्कि और रफ्तार पकड़ ली।

संभावना जताई जा रही है कि इसमें किन्हीं शरारती तत्वों का हाथ है। सवाल ये उठता है कि आखिर चोटी कट कैसे रही है ? देश के विभिन्न राज्यों में इस प्रकार की घटना का घटित होना अपने में एक बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा देता है।

इस प्रकार की घटनाओं से बाल मन पर बुरा असर पड़ता है। बड़े बुजुर्ग भी प्रभावित होते हैं, किन्तु उनका विकसित दिल दिमाग सोचने समझने की शक्ति और पूर्व की अफवाह की याद्दाश्त ऐसी भयावह स्थिति से बचा लेने में सक्षम होता है।

अगर यह अफवाह है तो समाज की जिम्मेदारी बनती है कि मासूम मन को भविष्य के लिए तैयार करने हेतु ऐसी अफवाह से बचा लेना होगा। सूचना तकनीकी, संचार क्रांति के इस दौर में घर घर टेलीविजन होना व सोशल मीडिया यूजर होने से जहाँ सुविधा मिली है वहीं ऐसी अफवाह को तूफान से भी तेज गति से फैलाने में शरारती तत्व सफल हो जाते हैं फिर मीडिया भी लकीर कै फकीर की भांति रह जाती है।

अब चोटी कांड का शोध चल रहा है। तमाम प्रकार की बातें सातें की जा रही हैं। ख्यालों के बतासे बनाए जा रहे हैं। कौन आता है, कौन नहीं आता, आखिर चोटी काण्ड को अंजाम देने वाला है कौन ? कैसे कट जाती है चोटी ? महिलाओं को अपने केश से सबसे अधिक प्रेम होता है। बड़े बड़े केश उनकी खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं। पुरूषों को भी खुल केश की औरत बड़ी खूबसूरत महसूस होती है। फैशन के दौर में चोटी पहले ही कट चुकी थी। ब्वाय कट हेयर खूब चलन में आ गया। बहुत सी कामकाजी, शिक्षित महिलाएं चोटी को पहले ही अलविदा कह चुकी थीं। ब्वाय कट हेयर स्टाइल की वो महिलाएं भी खूबसूरत लगती हैं। हर किसी की अपनी अलग स्टाइल होती है।

जब हम मन मस्तिष्क से ऐसा करते हैं तब चर्चा का विषय नही होता है। इस दौरान एक बात याद आई कि ग्रामीण इलाकों में "बुढिया के बाल" खूब बिकते हैं। कुछ छोटे मोटे व्यापारी गांवों में जाकर महिलाओं के झड़े, कटे केश के बदले बच्चों को गुलाबी रंग के बुढिया के बाल दिया करते हैं। जिसका स्वाद बच्चों को खूब भाता है और गुलाबी रंग के बुढिया के बाल बच्चों को खूब भाते हैं।

इसके पीछे धंधा मंदा होने की बात महसूस की जा सकती है। इस प्रकार की अफवाह उड़ाकर धंधा जोर में आ सके। इस दौरान ही चुटिया ना कटे जिससे विद्वानों द्वारा सुझाव आ गया कि घर के मुख्य दरवाजे पर हल्दी के हाथ लगा दीजिए। इससे कांग्रेस का भी खूब प्रचार हो सकता है। हाल ही में भाजपा ने एक अभियान चलाया था कि "मेरा घर भाजपा का घर"। इस अभियान की वजह से कांग्रेस के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा था। अब कांग्रेसी कम से कम कह सकते हैं कि घर घर कांग्रेस है। जहाँ जहाँ अफवाह फैल चुकी है, वहाँ वहाँ चुड़ैल से बचने हेतु घर के मुख्य द्वार पर हल्दी से हाथ लगाए जा रहे हैं।

अफवाह एक है जिसके फायदे नुकसान के अनेक नजरिए हैं। पंडितों का धंधा भी जोर में आता महसूस हो रहा है। पंडित चुड़ैल से बचने व चोटी ना कटने के उपाय बताते हैं। वाजिब है कि पंडित जी की दक्षिणा धनराशि पहले ही पक्की हो जाती है। इस प्रकार से आम जनता को यह समझने बूझने का वक्त आ गया है कि समय के अनुसार मुहनोचवा, मंकी मैन और तिलचट्टा जैसी अफवाह की तरह यह अफवाह भी खूब प्रचलन में आई और शरारती तत्व एक बार फिर कामयाब हो रहे हैं।

घर के अंदर चोटी कट जाना वास्तव में विस्मयबोधक है परंतु अब इसमें भी बड़ी साजिश महसूस हो रही है कि सोते वक्त कोई भी आपके साथ ऐसा मजाक कर सकता है और मुन्नी बदनाम हुई की तरह चुड़ैल बदनाम हो रही है। कहीं कोई चुड़ैल है ही नहीं।

जो भारत वैज्ञानिक अनुसंधान के जरिए मंगर गृह तक पहुंच गया। हर बीमारी का इलाज हो रहा है उस भारत में ऐसी अफवाह का फैल जाना और मजाक मजाक में दहशत का फैलना अपने आप में अफसोस जनक है।

पुरूषों की तुलना में महिलाओं का मस्तिष्क अधिक संवेदनशील होता है। किसी के भी मस्तिष्क की चोटी का यह भाग ब्रह्मांड से तरंगों को गृहण करने में सक्षम होता है। पौराणिक ग्रंथो के मुताबिक विद्वान पुरूष चोटी रखते थे और आज भी रखते हैं। हिन्दू समाज में ब्राह्मण प्राचीन समय से ही चोटी रखते चले आ रहे हैं। जिसके वैज्ञानिक पहलू भी कहते हैं कि चोटी का अपना विशेष महत्व है।

महज अन्य अफवाह की तरह यह भी एक अफवाह साबित हो रही है। भूत प्रेत निशाचर की कहानी फिर से चर्चा में आ चुकी है। लोगों के घरों के अंदर और मन मस्तिष्क में दहशत का माहौल अफवाह के ताले से बेड़ा जा रहा है।

शिक्षित समाज के अंदर ऐसी किसी भी अफवाह का असर नहीं है परंतु अशिक्षित समाज में ग्रामीण क्षेत्र तक इसका असर दहशत का जलवा कायम किए है। इसका सामाजिक राजनीतिक व्यापारिक पहलू यही साबित करता है कि महज अफवाह है। हमें अफवाह से बचना होगा, इस प्रकार की धर्मांधता से बचकर ही हम जागरूक नागरिक कहला सकते हैं। अफवाह के सा इस प्रकार का मजाक भी अफसोसजनक है। जिससे मनुष्य के मन मस्तिष्क में नकारात्मक व दहशत का माहौल जन्म ले।



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