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मोदी सरकार के पूरे हुये 3 साल फिर भी बुन्देलखण्ड बेहाल , अब क्या करेगी यूपी की योगी सरकार

भौगोलिक और सांस्‍कृतिक विविधताओं के बावजूद बुंदेलखंड में जो एकता और समरसता है, उसके कारण यह क्षेत्र अपने आप में सबसे अनूठा बन पड़ता है। अनेक शासकों और वंशों के शासन का इतिहास होने के बावजूद बुंदेलखंड की अपनी अलग ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्‍कृतिक विरासत है।  बुंदेलखंड लोहा, सोना, चाँदी, शीशा, हीरा, पन्ना आदि से समृद्ध है। इसके अलावा यहाँ चूना का पत्थर भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। विन्धय पर्वत पर पाई जाने वाली चट्टानों के नाम उसके आसपास के स्थान के नामों से प्रसिद्ध है जैसे - माण्डेर का चूना का पत्थर, गन्नौर गढ़ की चीपें, रीवा और पन्ना के चूने का पत्थर, विजयगढ़ की चीपें इत्यादि। जबलपुर के आसपास पाया जाने वाला गोरा पत्थर भी काफी प्रसिद्ध है। इस प्रांत की भूमि भोजन की फसलों के अतिरिक्त फल, तम्बाकू और पपीते की खेती के लिए अच्छी समझी जाती है।

यहाँ के वनों में सरई, सागोन, महुआ, चार, हरी, बहेरा, आँवला, घटहर, खैर, धुबैन, महलौन, पाकर, बबूल, करौंदा, सेमर आदि के वृक्ष अधिक होते हैं। पिछले दिनों बुन्देलखण्ड के दौरे पर आईं केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री सुश्री उमा भारती ने कहा था कि अगले तीन साल में मप्र के बुंदेलखंड को सूखा मुक्त कर दिया जाएगा। इसके लिए केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने करीब 800 करोड़ रुपए की योजनाएं बनाई हैं। लगभग यही बात यूपी के हिस्से वाले बुन्देलखण्ड के जिलों के लिए भी उन्होंने घोषणा की थी । लेकिन आज भी स्थिति जस की तस है। उन्होंने यह भी कहा था कि मप्र और उप्र के बुंदेलखंड क्षेत्र में 99 प्रोजेक्ट शुरू किए जा रहे हैं। इनमें से मप्र के बुंदेलखंड के 14 प्रोजेक्ट पर 2716 करोड़ रुपए खर्च होंगे, जिससे 8 लाख 72 हजार हैक्टेयर भूमि सिंचित होगी। खेती के साथ-साथ सिंचाई में भी मप्र आगे बढ़ेगा। बुंदेलखंड के विकास में कोई कमी नहीं छोड़ी जाएगी। उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड के जल मंदिर भी अब अच्छे होंगे।

उन्होंने एक बार फिर बुंदेलखंड के लोगों से कहा कि दिल्ली में मजदूरी के लिए नहीं, राज करने जाएं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि क्या पिछले तीन सालों में बुन्देलखण्ड की तस्वीर में तनिक भी परिवर्तन हुआ है । शायद इसका उत्तर सरकार के पास भी नही होगा। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने बुन्देलखण्ड क्षेत्र के लिए 3630 करोड़ रूपये आवंटित किये थे. इस आवंटन में से 1304 करोड़ रूपये राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन कोष से प्रदेश सरकार को दिये। मोदी सरकार ने यह धन सीधे प्रभावित लोगों के बैंक खाते में भेजने के लिए दिया था लेकिन अखिलेश सरकार ने इस धन को प्रभावितों तक पहुंचाया ही नहीं।

उमा ने कहा कि केंद्र सरकार ने महोबा, चित्रकूट और बांदा, बुन्देलखण्ड क्षेत्र को पेयजल उपलब्ध कराने के लिए योजना बनाई थी लेकिन एसपी सरकार ने यह योजना सफल नहीं होने दी. साल 2016-17 में 700 करोड़ रूपये बुन्देलखण्ड को मनरेगा के तहत दिया गया, जिससे बदहाल जनता को राहत मिल सके. उन्होंने यह भी कहा था कि बुंदेलखंड के किसानों को सूखे की मार से उबारने के लिए मोदी सरकार ने सिंचाई की सुविधा, जलाशयों की मरम्मत आदि के लिए बुन्देलखण्ड क्षेत्र को राशि दी। बुन्देलखण्ड के विकास के लिए सहकारी संस्थाओं के माध्यम से पेयजल और विद्युतीकरण की योजनाएं चलाई जानी थी जो लम्बे समय तक बुन्देलखण्ड की तरक्की में मददगार हो सकती थी ।

फिलहाल अब बुन्देलखण्ड के लोगो को यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से काफी आशाएं हैं । आपको बता दें कि अभी हाल ही में बुदेलखंड के दौरे पर निकले यूपी से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने झांसी में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा था कि बुंदेलखंड के भाग्य का उदय होगा। उन्होंने कहा था की सरकार बिना भेदभाव सबको सुरक्षा देगी और किसी को अराजकता फैलाने नहीं देगी। आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विभाजित बुन्देलखण्ड इलाका पिछले कई वर्षो से प्राकृतिक आपदाओँ का दंश झेल रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार बुंदेलखंड इलाके में भुखमरी और सूखे की त्रासदी से अब तक 62 लाख से अधिक किसान श्वीरों की धरतीश् से पलायन कर चुके हैं।

फिलहाल एक बात तो अब सबको समझ आ रही है कि जब चुनाव नजदीक आते हैं तभी  सभी पार्टियों की नजर बुंदेलखंड के क्षेत्र पर होती है । चुनाव के बाद हर पार्टी के सूरमाओं द्वारा सिर्फ लच्छेदार भाषण ही सुनने को मिलते हैं। बुन्देलखण्ड में अभी भी समस्याओं का अम्बार लगा है। कुछ किसानों से हमने इस विषय लॉ बात की तो उन्होंने भी कहा की, बाबू जी ! जब चुनाव का समय आवत है, तौ सबै का हमार याद आवत ही, पै कौनों हमार सहायता नाही करत।

मोदी सरकार से आस रही है लेकिन अब तौ तीन बरस बीत गए। दरअसल, अगर मोदी सरकार के रणबांकुरों की बात करे खासकर बुन्देलखण्ड के चारों सांसदों की, तो पिछले तीन साल के कार्यकाल में किसानों के दुःख दर्द के सामने सभी का आत्मविश्वास बौना ही नजर आया है। लोकसभा में सभी ने किसानों के एकाध मुद्दे तो मजबूती से उठाए पर, दिल्ली से ऐसी कोई योजना नहीं ला सके जो किसानों का दर्द कम कर सके और न ही इनके द्वारा ऐसे कोई भी ठोस प्रयास किए गए जो सूखे और बाढ़ के समय किसानों के आंसू पोछने के काम आ सके। बुन्देलखण्ड के कुछ समाजसेवियों की मानें तो हर पांच साल बाद यूं ही सभी को चुनावी बयार के समय बुन्देलखण्ड की याद आती है। कहीं न कहीं वोट का मामला होता है।

कुछ का कहना था कि हम चाहते हैं कि अपने घण्टे भर के भाषण में प्रधानमंत्री जी ज्यादातर समय किसानों के नाम दें, साथ में ये भी बताएं कि क्या उनकी सरकार के पास बुन्देलखण्ड के विकास के लिए कोई ठोस मॉडल है, या केवल योजनाओं की घोषणा भर है, या फिर यहां की जनता को सिर्फ गरीबी और भुखमरी में ही अव्वल दर्जा प्राप्त होता रहेगा।

अभी हमारी टीम ( बुन्देलखण्ड न्यूज - बुन्देलखण्ड कनेक्ट पत्रिका) बुन्देलखण्ड चर्चा के कार्यक्रम के तहत चित्रकूट मंडल की यात्रा की । जिसमे हमने 2150 किमी की यात्रा 12 दिनों में पूरी की और चारो जिलों (बाँदा , चित्रकूट , हमीरपुर ,महोबा) के तमाम गाँवो ,कस्बो और नगर में जाना हुआ । बुन्देलखण्ड में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल अभी भी जस का तस बना हुआ है ।

दरअसल , काफी लंबे अर्से से बुन्देलखण्ड में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर सियासी गलियारों में बहस चलती रही है लेकिन आज तक इसका कोई हल नही निकला । समूचे बुन्देलखण्ड में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहद लचर हैं और इसके लिए कहीं न कहीं व्यवस्था जिम्मेदार है । बुन्देलखण्ड चर्चा के दौरान जब हमने चित्रकूट धाम मंडल का दौरा किया तो हमने पाया कि हर सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों की भारी कमी थी । अगर हम चित्रकूटधाम मंडल के सभी जिला चिकित्सालयों की बात करें तो स्थिति बहुत ही गम्भीर है । हर जगह डॉक्टरों की कमी है । सबसे ज्यादा बदतर स्थिति प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की है जहाँ डॉक्टरों के स्थान पर कुत्ते बिल्लियां टहलते मिलते हैं । जब हमने इस सम्बन्ध में स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों से बात की तो उन्होंने बताया कि हमारे यहाँ डॉक्टरों की बहुत ज्यादा कमी है । अगर पूरे जिले में 95 डॉक्टरों की जगहें हैं तो हमारे पास सिर्फ 20-25 स्टाफ ही है । ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना हमारे लिए खुद एक बड़ा चैलेंज है ।

चित्रकूट ,बांदा और हमीरपुर के जिला चिकित्सालयों में तैनात डॉक्टरों की अगर बात करें तो यहाँ सबसे ज्यादा सरकारी डॉक्टर प्राइवेट प्रेक्टिस करते पाये गये । फिलहाल योगी सरकार का कहना है कि किसी भी हालत में सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रेक्टिस बर्दाश्त नही की जायेगी । इसी प्रकार अगर हम चित्रकूट मंडल के नगर और कस्बो में बने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की बात करें तो स्थिति बद से बदतर है । मानिकपुर , पहाड़ी , अतर्रा , तिंदवारी , नरैनी , राठ ,हमीरपुर ,भरुआ , सरीला , चरखारी सहित चित्रकूट धाम मंडल के अधिकांश नगर-कस्बो की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं लचर है जिसके लिए कहीं न कहीं स्थानीय प्रशासन जिम्मेदार है ।

स्वास्थ्य सेवाओं की लचर व्यवस्था में एक तस्वीर हमने ऐसी भी देखी जिसे शब्दो में बता पाना कठिन है । चित्रकूट धाम मंडल के चारो जिलों में बुन्देलखण्ड की चर्चा के दौरान हमने श्दलालश् शब्द का नाम खूब सूना । जांच पड़ताल के पता लगा की ये दलाल डॉक्टरों से लेकर दवा की दुकान तक दलाली करते हैं । गरीबो के पैसे की दलाली करने वाले इन लोगो का चेहरा तो हम नही देख पाए लेकिन ये आपको हर अस्पताल और दवा की दुकान में दिख जायेंगे । इस दलालों पर लगाम लगाने की जरूरत है । क्योंकि ये उन गरीबों का पैसा खा जाते हैं जिनके पास दो वक्त की रोटी के जुगाड़ की चुनौती होती है ।

पिछले तीन वर्षों के कार्यकाल के बाद अब अगले दो वर्षों में मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी बुन्देलखण्ड में बन्द पड़े उद्योग धंधों को चालू कराते हुये यहाँ बढ़ती बेरोजगारी को काबू करने की ।

बुन्देलखण्ड के पिछड़ेपन के लिए यहाँ के बन्द हो गए उद्योग धंधों को सबसे बड़ा कारण माना जाता है । बुन्देलखण्ड में रोजगार का कोई बड़ा साधन न होने के कारण बेरोजगारी इस कदर बड़ी की लाखों लोगो को पलायन करना पड़ा । बुन्देलखण्ड की चर्चा के दौरान जब हमने चित्रकूट धाम मंडल का दौरा किया तो सारी हकीकत से हमारा सामना हुआ । एशिया की एकमात्र बरगढ़ ग्लास फैक्ट्री जिसका शिलान्यास अस्सी के दशक में हो गया था लेकिन कुछ काम होने के बाद इस फैक्ट्री को बंद कर दिया गया ।

बुन्देलखण्ड के हजारो किसानों मजदूरो को मिलने वाला रोजगार का ये बड़ा केंद्र शुरू होने से पहले ही बन्द हो गया । करोडो अरबो की मशीने नीलाम कर दी गई । आज भी बरगढ़ ग्लास फैक्ट्री की दीवारें चींख चींख कर अपनी बदहाली पर रो रही हैं ।  इसी प्रकार मानिकपुर की बॉक्साइट फैक्ट्री जो दशकों पहले बन्द हो गई थी । इस फैक्ट्री में हजारो मजदूर काम करते थे लेकिन फैक्ट्री बन्द होते ही सब बेरोजगार हो गए । वैसे तो पूरे चित्रकूट धाम मंडल में छोटे छोटे उद्योग बड़ी संख्या में थे लेकिन आज सब बन्द हैं। 

ऐसे ही बांदा की भरुआ सुमेरपुर में मौजूदा समय में लगभग सभी फैक्ट्रियां बन्द हो चुकी हैं । एकाध फैक्ट्रियां चालू हैं लेकिन ये नाकाफी है । फैक्ट्रियां बन्द होने के कारण बड़ी संख्या में आस पास के लोग बेरोजगार हो गए । बुन्देलखण्ड की चर्चा के दौरान जब हमने स्थानीय लोगो से बात की तो सभी ने बताया कि भरुआ सुमेरपुर की पहचान इन्ही फैक्ट्रियों से होती थी लेकिन आज इनके बंद होने के कारण सब बदल गया है । ऐसे ही हमीरपुर और महोबा की भी हालत है । कुलमिलाकर अगर हम सपनो के बुन्देलखण्ड की बात करें तो सबसे पहले सरकार को यहाँ उद्योग धंधों को चालू करना होगा तभी यहाँ का विकास हो सकता है और पलायन रुक सकता है ।

सबसे खास बात यह है कि बुन्देलखण्ड में बेइंतहा खनिज सम्पदा है, लेकिन सब खनन माफियों द्वारा लूटा जा रहा है, जिसमें ज्यादातर सफेदपोशो के हाथ हैं। गौरतलब है कि पिछले तीन दशक से बुन्देलखण्ड में भयंकर सूखा पड़ रहा है और इस बार तो बाढ़ ने सब बर्बाद कर दिया है। बुन्देलखण्ड के अधिकांश किसानों को अब भी आशा है की प्रधानमन्त्री जी जरूर उनकी मदद करेंगे और उनके दर्द को समझेंगे।