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ज्ञान का दीपक जलाकर जीवन को धन्य बनायें:विराग सागर

युग प्रतिक्रमण प्रवर्तक, विशाल यति संघ के नायक, विश्व विख्याात महाश्रमण परम पूज्य युगप्रमुख श्रमणाचार्य उपसर्ग विजेता राष्ट्र संत बुन्देलखण्ड के प्रथम गणाचार्य 108 विराग सागर महाराज ने अतिशय जैन तीर्थ करगुवांजी में आयोजित यति सममेलन महामहोत्सव के पंचम दिवस अपनी ओजस्वी वाणी में उद्बोधन देते हुये कहा कि जीवन में दीपक होना चाहिये। दीपक वह भी जलता हुआ होना चाहिये।

दीपक हो जलता हुआ न हो तो उसकी कोई कीमत नहीं है यदि जलता हुआ दीपक होगा तो वह प्रकाश देगा और उसके माध्यम से अंधकार दूर हो जाता है। अभी शास्त्र विमोचन हुये, मैं यही प्रार्थना कर रहा था कि हे भगवन संसार के सभी प्राणियों के जीवन में ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश हो। अज्ञान रूपी अंधकार उनके जीवन से सदा -सदा के लिये दूर हो जाये। अज्ञानी प्राणी ज्ञान के अभाव में न जाने कितने प्रकार के पाप कर लेता है जिसका फल एसे आगामी समय में प्रत्येक क्षण दुख प्रदान करता है।चारों ओर फैले इस घनघोर अंधकार के कारण प्रत्येक व्यक्ति आत्म कल्याण के उपायों को समझ ही नहीं पा रहा हैं ज्यादा से ज्यादा और अधिक भौतिक सुख सुविधायें पाने के लालच में बेसुध हुआ जा रहा है। न उसे कल की चिंता है और न ही उसे आज की चिंता है।  

पूज्य गणाचार्य ने दिव्य देशना देते हुये कहा कि सत्यता तो ये है कि जीवन का कोई भरोसा नहीं है। कब, कहां किस गली के मोड पर जीवन की शाम हो जाये। यदि जीवन की शाम होने से पहले हम संभल जायें और संभलकर सावधान हो जायें तो ही अच्छा है। किसी शिकारी द्वारा अनजाने में तीर चलाकर किसी जीव की हत्या को घोर पाप बताते हुये वे कहते हैं कि यति हत्या सबसे बडा पाप माना गया है। दुनिया में बडे से बडे पापों का प्रायश्चित है किन्तु यति हत्या का प्रायश्चित नहीं है।

इस प्रकार के पाप कर्मों से जब आपकी आत्मा अथवा कोई आपको रोके तो समझना कि न जाने कौन से आपके द्वारा किये गये पुण्य की घडी उदय हुई है। वैसे पुण्य की घडी जब उदय मानी जाती है जब कोई व्यक्ति पुण्य की ओर बढता है, संयम लेने और उनका पालन करने का संकल्प लेने का समय ही पुण्य उदय होने का क्षण है। धन, दौलत या सम्पदा प्राप्त होना पुण्य का उदय नहीं है, यह केवल तुम्हारें पुराने पुण्य का उदय हैं। अतः अपने जीवन से अज्ञानता को हटाकर ज्ञान का प्रवेश करो और अच्छे काम कर मनुष्य लत्रजीवन को सार्थक करो।
 
कब तक बासी खते रहोगेः लोंगो में पुरूषार्थ करने की आदत बढे इसलिये धर्म सभा को सम्बोधित करते हुये आचार्य श्री ने कहा कि हमारे पूज्य गुरूदेव विमल सागर जी कहा करते थे कि संसार के सभी प्राणी बासा खाते हैं। यह बासी कब तक खाते रहोगे, सबकी पसंद ताजी है, सब सोचते हैं ताजी मिले पर थाली में आते ही बासी हो जाती है क्योंकि ताजी पाने के लिये कोई प्रयत्न ही नहीं किया, पुरूषार्थ नहीं किया तो ताजी मिलेगी कैसे। उन्होंने आवाहन किया अब तो पुरूषार्थ में लगकर अगले जन्म को सुधारने की कोशिश में लग जाओ अन्यथा पूर्व कर्मों के पुण्य उदय से जो सुसुविधायें मिली हैं वे आगे मिलने वाली नहीं हैं।

खण्डवा से आई कामिनी द्वारा सिर पर तीन कलश और उसके उपर जलते हुये दीपक रखकर मंगलाचरण की भावभीनी प्रस्तुति दी। म.प्र. के टीकमगढ निवासी निखिल जैन ने दीप प्रज्वलन, सोनू वैसाखिया, संजीव वैसाखिया कुमकुम,बवलू, यश मैनवार ने सपरिवार  पाद प्रक्षालन किया। बाबूलाल सर्राफ टीकमगढ ने चित्र अनावरण व शास्त्र भेंट किया। सायंकाल 7 बजे बडे बाबा की भक्तिमय महाआरती हुई, रात्रि 8 बजे शास्त्र सभा उपरान्त उमरगा (महाराष्ट्र) से आये राजेन्द्र जी एण्ड पाटी के कलाकारों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति देकर वाहवाही लूटी। संचालन प्रवीण कुमार जैन ने किया । अंत में महामहोत्सव  समिति के अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने आभार व्यक्त किया।

इनका हुआ सम्मानः- नगर निगम की महापौर श्रीमती किरन राजू बुकसेलर, शिक्षाविद डा. सुश्री नीति शास्त्री, वरिष्ठ समाज सेवी अशोक यादव, होटल एशोसियेशन झांसी के अध्यक्ष बालकृष्ण अरोरा, निर्मल जैन नोएडा, मदनलाल जैन सतना, राकेश जैन, बबलू, अंकित जैन नौगांव, डा. महेश जैन बुखारिया टीकमगढ, गुलाब चन्द्र जैन केशवगढ ने आचार्य श्री के चरणों में श्रीफल भेंटकर दर्शन लाभ लिया। महामहोत्सव समिति की ओर से पूर्व मंत्री प्रदीप जैन आदित्य,व्यापारी नेता शैलेन्द्र जैन, पंचायत अध्यक्ष प्रकाश चन्द्र जैन, कार्या. राजीव सिर्स, एवं महोत्सव के मुख्य प्रभारी सुभाष जैन ठेकेदार ने अतिथियों को सम्मानित किया। संचालन प्रवीण जैन एवं आभार कार्यक्रम संयोजक विनोद जैन ठेकेदार ने व्यक्त किया।

21 लाख से अधिक लोंगो को लाभन्वित किया
इस अवसर पर श्रमणी आर्यिका विशिष्टश्री माताजी एवं विशुद्ध सागर ने ने अपना सारगर्भित सम्बोधन देते हुये गुरू विराग सागर की महिमा का वर्णन करते हुये कहा कि गुरू परमात्मा की कृति, आत्मा की विधि, संसार की निधि और मोक्ष मार्ग की विधि है। गुरू विराग सागर में मां की ममता और बालक की निश्छलता जैसे गुणों से निहित अरिहंत पथ पर चलने वाले साक्षात भगवान महावीर का रूप हैं। वे एक दिन अवश्य सिद्धता को प्राप्त करेंगे। आचार्य श्री ने अब तक दस प्रांतों में शिविर लगाकर अहिंसा, व्यसन मुक्ति एवं शाकाहार अभियान द्वारा 21 लाख से भी अधिक लोंगो को लाभान्वित कर अहिंसा के मार्ग पर लगा दिया हैं। आचार्य भगवन ने युग प्रतिक्रमण व यति सम्मेलन तथा मुनि आर्यिकाओं को श्रमण श्रमणी सम्बोधन जैसी विलुप्त होती प्राचीन परम्पराओं को पुनर्जीवित कर इसे सजाने और संवारने का काम किया है। युग प्रतिक्रमण एवं यति सम्मेलन के इस आयोजन से अशितय क्षेत्र करगुंवाजी महातीर्थ बन गया है।

आचार्य विशुद्ध सागर जी का मंगल प्रवेश
वृहद यति सम्मेलन में अनेकानेक साधु संघों की श्रृंखला में आज पूज्य गुरूवर के वरिष्ठ शिष्य श्रमणाचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज का ससंघ आगमन करगुवांजी में हुआ। मंदिर के मुख्य द्वार पर उनकी भव्य आगवानी की गई।
 

पुलिस अधिकारी ने लिया नियमः- यति सम्मेलन के अवसर पर गणाचार्य विराग सागर के प्रवचन सुनकर उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में उपनिरीक्षक के पद पर पदस्थ जयवीर सिंह यादव तो इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने आचार्य श्री के श्री चरणों श्रीफल भेंटकर रात्रि में भोजन न करने, शाकाहारी भोजन करने आदि का नियम व्रत लिया। महोत्सव समिति की ओर से अध्यक्ष प्रदीप जैन आदित्य एवं महामंत्री प्रवीण जैन ने एस. आई जयवीर सिंह यादव  को पगडी पहनाकर समम्मनित किया ।