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SC में केंद्र ने कहा - 1400 साल से चल रहा उत्पीड़न है तीन तलाक

सुप्रीम कोर्ट ने आज ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) से पूछा कि क्या महिलाओं को ‘निकाहनामा’ के समय ‘तीन तलाक’ को ‘ना’ कहने का विकल्प दिया जा सकता है।

जीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह भी कहा कि क्या सभी ‘काजियों’ से निकाह के समय इस शर्त को शामिल करने के लिए कहा जा सकता है। पीठ में न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ, न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन, न्यायमूर्ति यूयू ललित और न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर भी शामिल हैं।

केंद्र ने कहा कि यह मामला बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक का नहीं है। यह एक धर्म के भीतर महिलाओं के अधिकार की लड़ाई है। इस मामले में विधेयक लाने के लिए केंद्र को जो करना होगा वह करेगा, लेकिन सवाल ये है कि सुप्रीम कोर्ट क्या करेगा?

इसके बाद चीफ जस्टिस ने कहा कि अस्पृश्यता, बाल विवाह या हिंदुत्व के भीतर चल रही अन्य सामाजिक बुराइयों को सुप्रीम कोर्ट अनदेखा नहीं कर सकता है। कोर्ट इस मामले में अपनी जिम्मेदारी से इनकार नहीं कर सकता है।

दूसरी ओर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि अगर तलाक के तीन तरीकों को खत्म किया जाता है, तो केंद्र इसके लिए प्रक्रिया बनाएंगे। एक समुदाय यह निर्णय नहीं कर सकता कि मौलिक अधिकारों के खिलाफ पर्सनल लॉ को जारी रखा जाए या नहीं। उन्होंने कहा कि मामला मर्द और औरत के बीच शक्ति संतुलन के मोलभाव का नहीं है। यह 1400 सालों की परंपरा नहीं, बल्कि 1400 साल से चलता आ रहा उत्पीड़न है।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, ‘‘क्या यह संभव है कि मुस्लिम महिलाओं को निकाहनामा के समय ‘तीन तलाक’ को ‘ना’ कहने का विकल्प दे दिया जाए?’’ पीठ ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल से जवाब मांगते हुए कहा, "हमारी तरफ से कुछ भी निष्कर्ष ना निकालें।"

तीन तलाक, बहुविवाह और ‘निकाह हलाला’ को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पीठ के समक्ष चल रही सुनवाई का आज पांचवां दिन है। पीठ में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी सहित विभिन्न धार्मिक समुदायों के सदस्य शामिल हैं।

जमीयत उलेमा-ए हिंद की तरफ से वकील राजू रामचंद्रन ने कोर्ट के सामने कहा कि अगर तीन तलाक देने के बाद कोई पति अपनी पत्नी के साथ रहता है तो वो गुनाह होगा।

इससे पहले मंगलवार को हुई सुनवाई में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि तीन तलाक का पिछले 1400 साल से जारी है। अगर राम का अयोध्या में जन्म होना, आस्था का विषय हो सकता है तो तीन तलाक का मुद्दा क्यों नहीं।

कपिल सिब्बल ने कहा कि इस्लाम धर्म ने महिलाओं को काफी पहले ही अधिकार दिये हुए हैं। परिवार और पर्सनल लॉ संविधान के तहत हैं, यह व्यक्तिगत आस्था का विषय है। जस्टिस कुरियन जोसेफ ने जब कपिल सिब्बल से पूछा कि क्या कोई ई-तलाक जैसी भी चीज है।