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विश्वपरिवर्तन में सहयोग की आवश्यकता

@अनुज पण्डित, वरिष्ठ शोधध्येता

विगत शताब्दियों में वैज्ञानिक आविष्कारों तथा प्रगति का सहारा लेकर धरती की संतानों ने अनेक लम्बी.लम्बी विकासयात्राएँ पूरी की हैं, जो वास्तव में कल्पनाशक्ति के क्षेत्र से बाहर है। जितनी तीव्र गति से प्रगति की उड़ानें भरी गयीं उतनी ही तीव्र गति से अस्थिरता, अशांति, अवसाद तथा शारीरिक व्याधियों ने भी पीछा किया।

अब समय आ गया है इस अबाध गति में अंकुश लगाने का क्योंकि इस विकासगति की राह में मनुष्य ने असंख्य अक्षम्य उद्दण्डता भी की है। प्रत्येक मनुष्य की एक सीमा है। जब इस सीमा का उल्लंघन कर मनुष्य अनैतिक और अप्राकृतिक रवैया अपनाने लगता है तो जगत् नियंता; जिसे आप प्रकृति, ईश्वर, खुदा विभिन्न नामों से आत्मसात कर सकते हैं, इन पर नियंत्रण करने की तैयारी में जुट जाता है।

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विकास की गति सामान्य ही होनी चाहिए क्योंकि बराबर भूभाग पर सामान्य चाल से चलते हुये मनुष्य को लक्ष्य प्राप्त करने में अपेक्षा से अधिक समय तो लग जाता है किंतु उसकी यात्रा सुखद और सुरक्षित रहती है। यदि मनुष्य गहरे गड्ढे या ढाल वाले रास्ते पर जाने के लिए हठ कर ले तो वह बहुत कम समय में लुढ़कते गिरते और चोटिल होते हुये हजारों फ़ीट नीचे गर्त में चला जायेगा।

मैराथन दौड़ में भाग लेने वाले प्रतिभागी भी एक सामान्य गति से ही दौड़ते हैं, तभी तो इतनी लंबी दौड़ वे आसानी से पूरी कर लेते हैं। यदि वे भी पूरी ऊर्जा को एक ही बार में लगाकर सरपट दौड़ने लग जायें तो कुछ ही किलोमीटर्स पर उनकी सांस फूलने लगेगी और वे थक.हार कर बैठ जायेंगे।

वर्तमान की स्थिति यह है कि समूचे विश्व के मनुष्यों ने भौतिकतावाद की होड़ में प्रकृति और अध्यात्म को कूड़ेदान में डाल दिया है, जिसके परिणामस्वरूप अनेक असाध्य बीमारियाँ, महामारियाँ तथा मानसिक अशांति साक्षात यमराज बनकर मुँह बाये खड़ी हैं, जो किसी भी क्षण सम्पूर्ण विश्व को लील सकती हैं।

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मनुष्य यह भूल गया कि उसे बनाने वाला एक अदृश्यमान कर्त्ता भी है जिसने सारी सृष्टि की कमान अपने हाथों पर ले रखी है। यदि मनुष्य उस नियंता की सम्पत्ति धरती अम्बर, ग्रह, पहाड़, पेड़,नदियाँ, समुद्र, हवा आदि को तहस नहस करने पर उतारू हो जायेगा तो त्वरित वह सर्वशक्तिमान नियंता अपनी सम्पत्ति की सुरक्षाव्यवस्था में तत्पर हो जायेगा और अनेकानेक परिवर्तन करके उसे सन्तुलन प्रदान करेगा।  

इसी परिवर्तन का समय चल रहा है जिसके कारण कोरोना जैसी मुसीबतें संसार को त्राहित्राहि करने पर विवश कर रही हैं। यह दण्ड है मनुष्य को उसकी उद्दण्डता का जो उसने प्राकृतिक वातावरण के साथ किया। किन्तु वह नियंता मनुष्य की तरह निर्मोही और बेपरवाह नहीं है। मनुष्य के साथ समस्त जीवों को वह अपनी ही सन्तान मानता है, अस्तु अपराधों का दण्ड देकर वह एक अद्भुत् सन्तुलन स्थापित करेगा। दुःख की रात इतनी भी लम्बी नहीं कि सुख का सवेरा लिये हुये सूरज का उदय न हो!

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इस सन्तुलन को बनाने में मनुष्य को बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने में  बेपरवाह नहीं होना है, बल्कि उसे अपनी आदतोंएकर्तव्योंए व्यवहारों तथा जीवनशैली में विशेष बदलाव करने की आवश्यकता है। तभी एक संतुलित, सुखी और स्वस्थ विश्व का निर्माण पुनः सम्भव है। अन्यथा यमराज का रथ तो तेजी से आगे बढ़ ही रहा है! सबसे महती आवश्यकता है जनसंख्या नियंत्रण की। लगातार बढ़ रही वैश्विक जनसंख्या के कारण आपसी प्रतिस्पर्धा चरम पर है जिसके कारण आपसी झगड़े और कलह जन्म ले रहे हैं।यह बढ़ती जनसंख्या मनुष्य को हतोत्साहित करके उसके लक्ष्य प्राप्ति में बाधा डालती है।

समानता का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है क्योंकि समाज में उच्च और निम्न वर्ग का अनुपात बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। बड़े.बड़े महानगरों के अतिरिक्त छोटे.छोटे नगरों एवं ग्रामीण क्षेत्रों में भी रोजगार के साधनों की व्यवस्था करके हम समाज के प्रत्येक मनुष्य तक रोजगार पहुँचा सकते हैं साथ ही प्रकृति प्रेम को महत्त्व देते हुये जंगलों और नदियों को भी संरक्षित.संवर्धित करें ताकि जीवन की सबसे उपयोगी वस्तुएँ हवाएपानी और औषधियाँ शुद्ध रूप में बनी रहें तथा प्रदूषण का खतरा कम हो सके।

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आरम्भ हो रहे विश्व परिवर्तन में हम अपने जीवन को बदलकर सरलएसादा औऱ सुंदर बनाकर सहयोग कर सकते हैं। सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धांत पर चलकर मनुष्य अपव्ययएविलासिताए प्रदर्शन को त्यागकर एक औसत मनुष्य बनने की कोशिश करे तभी स्थितियां भी समुचित बनेंगी। यदि भूमि पर कहीं गड्ढा है तो उसको ऊंची जमीन की मिट्टी से ढककर समतल कर सकते हैं ताकि सुखी जीवन के सुंदर पुष्प बराबर खिल सकें। जीवन में बदलाव हेतु उपयोगी शिक्षा और साहित्य  पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है ताकि स्वस्थ विचारों और जागरूक मनुष्यों का विकास हो सके जो विश्व के उत्थान में अग्रणी भूमिका निभाएंगें।

इसके साथ ही अध्यात्म औऱ चिंतन का आश्रय लेकर एक पूर्ण मनुष्य की शर्तों पर खरा उतर सकते हैं। जीवन में बदलाव की कड़ी में अनुशासन का भी महत्त्व है क्योंकि अनुशासन ही वांछनीय-अवांछनीय कार्यों पर नियंत्रण और सामंजस्य बिठाता है। समाज के वरिष्ठ और अनुभवी जन युवाओं में अनुशासन की भावना को जीवित रखने में मदद करें तथा उचित मार्गदर्शन करें, ताकि युवा अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह न बने।
इस प्रकार व्यक्ति को स्वयं में बदलाव करना होगा तभी एक सुखी और सुरक्षित विश्व की कल्पना साकार होगी। प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के साथ परस्पर सहयोग की भावना रखकर उसके सुख.दुःख में शामिल होकर यह संदेश दे कि हमें एक.दूसरे से किसी प्रकार का खतरा नहीं है। सारा विश्व एक परिवार है, तभी तो "वसुधैव कुटुम्बम्" की भावना सार्थक हो सकेगी!
"स्वयं बदलना होगा खुद को, ताकि बदल सके यह युग।"
"आओ मिलकर कसम ये खायें, सुंदर होगा यह कलयुग।"

                           

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