नेतृत्व को समझें, कोरोना से जीतना होगा

@सौरभ चन्द्र द्विवेदी, विश्लेषक
 
आपके मन मे नेतृत्व करने की सोच जन्म लेती है। आप राजनीति मे कुछ ना कुछ करना चाहते हैं , पर इंतजार इस बात का कि विधायक बन जाएं या सांसद बन जाएं और कुछ नहीं तो ग्राम प्रधान बन जाएं। अर्थात पद प्राप्त कर आप नेतृत्व करना चाहते हैं , किन्तु सोचने योग्य है कि नेतृत्व करना क्या पद प्राप्त करना है ? आज कितने विधायक - सांसद और मंत्री जनता की जनता बचाने के लिए साहस प्रदान कर नेतृत्व कर रहे हैं ? यह अंतर्मन से पूंछने का है और नेतृत्व की परिभाषा को समझने की जरूरत है। संकट के समय नेतृत्व की वास्तविकता का अहसास होता है !
 
 
 
हमारे यहाँ जातिवादी नेतृत्व भी पाया जाता है , अब जाति वाले भी चेतना की तीसरी नेत्र खोलकर देंख लें कि उनकी जाति का नेता जनता के साथ किन - किन माध्यम से लगातार जुड़ा हुआ है ? यह जातिवादी मानसिकता से बड़ा सवाल है और अंतर्मन से वह विचार करें कि उनका नेतृत्वकर्ता सोशल डिस्टेंस बनाते हुए जनता और जीवन के साथ है या नहीं !
 
 
नेतृत्व की अलग - अलग मानसिकता हमारे देश मे है। धर्म के आधार पर भी नेतृत्व खूब फला - फूला है। यहाँ तक की धर्म को हथियार बनाकर राजनीति करने वालों ने धर्म और जिंदगी की मानसिकता को खूब दूषित किया है ! हाल - फिलहाल धर्म के आधार पर धरना प्रदर्शन की कट्टरता और आक्रामकता से भी हम परिचित हुए जब जीवन को भय प्रदर्शनकारियों से सताने लगा। 
 
ऐसे अनेक तरह का नेतृत्व भारत मे सबसे अधिक फला - फूला। गांव को भी गुट मे बांटने का काम राजनीति ने किया और पंचायत चुनाव लड़ने वालों ने गांव - गांव मे जनता को लड़ाया है, प्रत्येक गांव मे सामूहिक विभाजन है। 
 
वर्तमान समय मे सरकार की कार्यशैली और दायित्व के अतिरिक्त अपवाद स्वरूप पदेन राजनीतिज्ञ को छोड़कर देखा जाए तो संपूर्ण भारत मे नेतृत्व की शून्यता नजर आ रही है। एक नेता चुनाव लड़ने से पहले और चुनाव जीतने के बाद तथा चुनाव हार जाने के बाद पुनः चुनाव जीतने के नेतृत्व से ही परिचित है। वह एनकेन प्रकारेण चुनाव जीतने की जुगत मे रहता है। 
 
माफिया युग में बालू माफिया सांसद - विधायक बनते हैं या फिर किसी भी तरह से उनके पास अथाह धन होता है जो हवा मे उड़ाया जा सकता है और इस तरह से लोकतंत्र में माफियाओं का राज हो गया। जिनको नेतृत्व की संवेदनशीलता का अहसास नहीं होता और ना ही नेतृत्व की परिभाषा को समझते हैं। अतः संकट के समय मानसिक चेतना को जागृत कर आत्मबल प्रदान करना उन्हें आता ही नहीं ! 
 
युवाओं को समझना होगा कि बात सिर्फ कुछ दिनों की है। संकट कुछ ही समय का है। इस संकट की घड़ी मे आपके गांव - कस्बा, नगर, महानगर और मुहल्ले में नेतृत्व की खास आवश्यकता है। सीमित संसाधनों में और मुफ्त की जागरूकता से आम आदमी को आत्मबल प्रदान कर प्रत्येक परिस्थिति को आप संभाल लेंगे। विपरीत परिस्थिति मे विजय प्राप्त कर लेना ही नेतृत्व है। जिंदगी के लिए काम करना नेतृत्व है। आम लोगों में जीवन ऊर्जा अखंड प्रज्वलित रहे, यह काम नेतृत्व कर सकता है। 
 

नेतृत्व के लिए किसी पद की ही जरूरत नहीं होती। नेतृत्व एक विचार है जो लोगों के मन मे प्रवाहित होकर संकट के समय उबरने मे सहायक होता है। कोरोना की भयावहता से बचने के लिए मन मे साहस होना चाहिए और लोगों के घरों मे रहते वक्त उत्तम संवाद से हम लंबा से लंबा समय हम सहज भाव से व्यतीत कर सकते हैं। 
 
यह एक जंग है , जो स्वतंत्रता सेनानी की तरह कोरोना सेनानी बनकर लड़ना होगा। बहुत से लोगों से सुना जाता रहा कि सरहद पार हम दुश्मन देश से लड़ने जाएंगे। अब यह जोशीला भाव कोरोना से लड़ने के काम आएगा। घरों मे रहकर और सोशल डिस्टेंस से बनाकर कोरोना से लड़ना है। 
 
 
यह नेतृत्व देश का युवा करेगा, जीवन हेतु करेगा। बिना किसी पद के, चूंकि पद वालों की कोई खास आवाज नहीं सुनाई दे रही है। जबकि वे साधन - संसाधन से परिपूर्ण हैं और देश - समाज व जीवन के लिए कब के निकलकर लोगों को जागरूक कर चुके होते, पर वे अपनी राजनीति करने ही फिर आएंगे। 
 
इसलिये हमें नेतृत्व की व्यापकता को समझना होगा। घर - परिवार और मुहल्ले मे जागरूक कर, मदद कर और सभी के लिए प्रार्थना कर नेतृत्व की परिभाषा को सार्थक सिद्ध कर सकते हैं। संकट के समय ही नेतृत्व की परीक्षा होती है। चूंकि पुलिस - पत्रकार और तमाम जिम्मेदार लोग समाज के प्रति उम्दा काम कर रहे हैं। प्रशासन भी मानवता के भाव से सतर्क होकर जान जाखिम मे डालकर जिंदगी के लिए प्रयासरत है।
 
अतः बहुत कुछ अच्छा है। इस अच्छाई की वजह से हम कोरोना से जंग लड़ रहे हैं और अन्य देश के मुकाबले अब तक हम ठीक स्थिति मे हैं। जो लोग आज चुपचाप हैं और जागरूकता हेतु सक्रिय नहीं हैं, जनता उनको चिन्हित कर ले। यदि जनता भूल ना जाए तो !
 
 
 
कोरोना को हम अहिंसा से हरा सकते हैं। कोरोना अहिंसा प्रेमी है। वह जनता से आपसी उचित दूरी चाहता है, जैसे भारी वाहनों के पीछे लिखा होता है कि " कृपया उचित दूरी बनाकर रखें " इसी का पालन करने की आवश्यकता है। 
 
दुर्घटना से देर भली, यह भी ट्रैफिक की दुनिया मे प्रचलित है। इसलिये कुछ दिन कुछ और ना सोचते हुए घरों पर रूक जाएंगे और सोशल डिस्टेंस बना लें फिर कोरोना से जंग जीतने के बाद शेष हिसाब किए जाएंगे।
 
 
इस वक्त युवाओं की परीक्षा है, खासतौर से जो नेतृत्व करना चाहते हैं तो आप पत्रकार हैं या सोशल एक्टिविस्ट बिना किसी पद के सामाजिक जिम्मेदारी निभाइए। वैसे भी पद के साथ मद आ जाता है जो कोरोना से कम खतरनाक नहीं कि वह मद सबकुछ लेकर छू हो जाता है। अंत सिर्फ इतना ही कि इस भाव को जीवंत रखना होगा। 
 
" जो कहते थे कि 
जाऊंगा सरहद पार 
दुश्मन देश से लड़ने " 
 
" वो घरों मे रहकर 
कोरोना से लड़ और 
बनें देश के सैनिक ! "