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पुलवामा में शहीद सैनिक की सच्ची दास्तान

@सौरभ चन्द्र द्विवेदी, विश्लेषक

विश्वजीत झा सीआरपीएफ में कमांडेंट हैं। वे एक सैनिक की दास्तान बता रहे हैं। आखिर कैसे एक सैनिक जान देकर जनता की रक्षा करता है।

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने कहा था, "एक फौजी भी नॉर्मल होता है, अगर उसे भागने का अवसर मिलता तो वो भी भाग जाता!"

अपनी बात करूं तो बचपन से कोई पैशन नहीं था कि मैं फौज में आऊं। अप्रैल 2010 में पटना में पढ़ाई कर रहा था। तभी दंतेवाड़ा में सी आर पी एफ के 76 जवान शहीद हो गये थे। कितना भयावह होगा मंजर जब एक साथ धरती पर 76 वीरों की लाशें लेटी होंगी। पेपर में जब यह खबर पढ़ा था तभी सोच लिया था कि कभी फौज में जाना हुआ तो सी आर पी एफ में ऑफिसर बनकर जाऊंगा। उस वक्त हल्की मूंछें रखता था! जब बॉर्डर मूवी आती थी तो अक्षय खन्ना को देखकर मां कहती थी कि मैं बिल्कुल उसके जैसा ही लगता हूं। खैर..... हर आदमी कुछ न कुछ यहां आकर बनता है, लेकिन सोल्जर पैदा होते हैं, भगवान कठिन जंग अपने सबसे चहेते योद्धाओं को देकर उनके किस्मत में ही लिख कर भेजते हैं कि वो फौजी ही बनेगा!

जब ट्रेनिंग कर रहा तो मेरे साथ मेरे कई बैचमेट थे जिन्हें दर्द की शिकायत होती थी, सुबह चला तक नहीं जाता था, तो उस्ताद कहते थे कि,"साहब आप हिम्मत मत हारो, आप फौजी हो!" उस वक्त यही लगता था कि हम भी तो एक आम आदमी ही हैं, लेकिन धीरे-धीरे इतने टफ हो गये कि जिस दर्द में इंसान रो दे, हम बीस किलोमीटर दौड़ जाते थे!

ट्रेनिंग खत्म करने के बाद, छत्तीसगढ़ में बस्तर, भारत के सबसे खतरनाक नक्सली इलाके में पोस्टिंग हुयी! पूरी कम्पनी की जिम्मेदारी एक कल के लौंडे पर आ गयी! मोबाइल का नेटवर्क भी नहीं था, कैम्प से जितनी दूर देखो अथाह जंगल, छुट्टी भी आना हुआ तो तीस किलोमीटर पैदल चलकर, ऑपेरशन में पार्ले-जी की बिस्किट और नाले का उबला पानी! मुद्दे से इतर हैरत है कि पतली दाल की शिकायत भी एक फौजी कर सकता है वो भी फील्ड एरिया में, और वामपंथी ताकतें फिर फौज के मनोबल को तोड़ने में कोई कसर भी नहीं छोड़तीं !

 

कई बार देखा कि, घर पर मां मर गयी और बेटा छुट्टी नहीं जा पाया। बूढ़ा बाप कैंसर से लड़ते-लड़ते बेटे की राह तकते हार गया और बेटा छुट्टी नहीं जा पाया, बहन डोली बैठ गयी और भाई राइफल थामें वतन की रखवाली ही करता रहा! धीरे-धीरे समझ गया कि एक फौजी बेहद अलग होता है किसी भी सिविलियन से। रिश्ते/नाते/जज्बात बिल्कुल मायने नहीं रखते उसके फर्ज के सामने। सुख-दुःख अपने साथी से शेयर करता है और दूर जंगल/पहाड़/बर्फ/रेगिस्तान में अपने बटुये में अपनी बीवी की फोटो देखकर बेपनाह मुहब्बत को महसूस करता है! कितना अलग हो जाता है वो सबसे! फिर भी जब मिट्टी आवाज दे चला जाता है हंसते-हंसते मिट्टी का कर्ज चुकाने!

एक फौजी जब छुट्टी जाता है। महीनों जिस मां ने चेहरा तो दूर बेटे की आवाज तक नहीं सुनी होगी, कितनी बाढ़ सी आती होगी उसकी ममता में! बहन जो सुनती है कि अमुक जगह इतने जवान शहीद हो गये, कितनी कांपती होगी उनकी उंगलियां ये सोचकर कि अब वो राखी का धागा पकड़ेगी या नहीं! वो बीवी सिंदूर की डिब्बी लेकर असमंजस में रहती होगी कि लगाऊं या नहीं! बाप मजबूत कलेजे के भीतर कितना रोता होगा यह सोचकर। तब एक फौजी छुट्टी पर घर पहुंचता है!

अपनी बात करूं तो बस्तर पोस्टिंग के वक्त मेरी मां छुट्टी खत्म होते ही मुझे एयरपोर्ट ड्राप करने आती थी। जब लिपटकर रोती तो सारे लोग समझ जाते कि मैं फौजी हूं। मां को हरदम शिकायत रहती कि मैं जाते वक्त मुड़ कर नहीं देखता! एक झूठ हर बार बोलना पड़ता था कि मुझे कुछ नहीं होगा और अमुक महीने वापस आ जाऊंगा! मां का कलेजा ठंडा हो जाता लेकिन मुझे मालूम था कि ,"हर बार फौजी वापस नहीं आते, कभी-कभी बस उसके जूते और यूनिफार्म ही वापस आते हैं!"

तेईस बरस का एक जवान अपने दोनों टांगों को खोकर दस दिनों में ही मुस्कुराते चेहरे के साथ जीता है! वो फायरिंग करता है यह कहकर कि उसकी टांगें गयीं हैं, हाथ सलामत हैं! कई जगहों पर एक फौजी जब जाता है तो उसे मालूम होता है वो वापस नहीं आयेगा, फिर भी वो जाता है, या तो जीतता है या शहीद होता है, लेकिन जाता है!

क्या लगता है उसके पास भागने का विकल्प नहीं था? वो यह सब पैसों के लिये कर रहा? अगर हां तो आप अपनी जान कितने रुपये में दे देंगे!

हर बार की तरह कहूंगा कि इतने सैक्रिफाइस के बाद भी जब कोई उसे हत्यारा/बलात्कारी कहता होगा तो उसपर क्या बीतती होगी! लेकिन फिर भी वो लड़ता है! क्योंकि मिट्टी के कर्ज और देश के लोगों के प्यार के सामने उसे अपनी जान और हर रिश्ते की कीमत बहुत छोटी लगती है।

यकीनन जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने अगर भारत की फौज को देखा होता तो हरगिज ऐसा ना कहता!

मुकद्दर में लिखा के लाये हैं भटकते ही रहना,

हो मौसम कोई, परिंदे  परेशान  ही  रहते  हैं !

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