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जय श्रीराम का नारा और दुष्कर्म तुष्टीकरण का खेल

@सौरभ चन्द्र द्विवेदी, विश्लेषक

बात जय श्रीराम के नारे की नहीं है बल्कि जय श्रीराम किस भाव से कहा गया है। चूंकि रावण भी साधु बनकर आया और सीताहरण कर ले गया। 

आज के युग मे भी ऐसे ही दशानन बहरूपिए हैं , जो जय श्रीराम का नारा लगा कुकृत्य करते हैं और राजनीति की अवधारणा को क्षीण करने व बल प्रदान करने की कोशिश करते हैं। 

इन कलयुगी दशानन को साथ इस युग के शिखंडी और वैचारिक सखियां प्रदान करती हैं। चूंकि इन्हें सिर्फ इतना ही सिद्ध करना है कि देखो जय श्रीराम का नारा लगाकर संघी विचारधारा और भाजपाई या भाजपा समर्थक घिनौना काम कर रहे हैं। 

यह तनिक भी नहीं सोचते कि एक आराध्य देव का नाम लेकर उसे बदनाम करने के लिए ऐसा प्रयास भी किया जा सकता है। 

ये अहिल्या और सीता का उदाहरण देंगी परंतु दैहिक रूपांतरण करने वाले संत रावण का वर्णन नहीं करेंगी , कि सोचती कि अरे रावण भी साधु पुरूष बनकर सीता हरण किया और कहीं हमारे ही समूह के लोग राजनीतिक नफा - नुकसान हेतु ऐसा तो नहीं कर रहे। 

खैर बात सिर्फ भाव की है , राम का नाम किसी भाव से लिया जा रहा है , और राम किसी का कंठ घोटने नहीं आएंगे , वह दुष्ट हो तो भी राम लीला का आनंद लेंगे। 

सोचेंगे कि देखो इन मनुष्यों को अपने उन्मत्त खेल मे मेरे नाम का प्रयोग दुष्कर्म के वक्त करके अपनी भौतिक विचारधारा को बल प्रदान कर रहे हैं और अहम् को तुष्ट कर रहे हैं। 

ये तुष्टीकरण के लिए इतना गिरा वैचारिक स्तरहीन खेल खेलते हैं , जहाँ एक बयान को आधार बनाकर घटनाएं करवाई जा रही हैं। 

इसलिये आवश्यक है कि राम के नाम का  कोई प्रयोग भी करे तो आप प्रयोग ना होनें दें। राम के नाम का दुरूपयोग होगा तो उसका दंड भी स्वयं फलित हो जाएगा। 

वैसे सत्य है कि हर युग में राक्षस राज संत का चोला पहनकर आते रहे हैं , फर्क सिर्फ इतना सा कि काल के अनुरूप घटनाओं का अंतर होता है। यह संघर्ष भी अनवरत शुरू रहेगा। 

इस दुनिया में युद्ध के लिए जितना तेजी से वैचारिक , शस्त्रबल से प्रयास हुआ उतना शांति और प्रेम के लिए नहीं हुआ , यही कारण है कि " जय श्रीराम " का नारा लगाते हुए दुष्कर्म की घटनाएं परिणाम मे सामने आती हैं। 

पर राम को क्या ?

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