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जो खुशी रेमन मैग्ससे नहीं देता , वो बीजेपी की हार मे है

@सौरभ चन्द्र द्विवेदी, विश्लेषक

रवीश कुमार को मैं लगातार कई वर्ष से सुन रहा हूँ। परमात्मा की कृपा से मेरे मन में आ जाए तो मानसिक रूप से फेस रीडिंग कर लेता हूँ। यह बड़ी गुप्त सी बात है और मेरी मानसिक सहमति मिलने पर ही संभव हो पाता है , तो यही वजह है कि मैं किसी भी मुद्दे पर अन्य पत्रकार का विश्लेषण और रवीश कुमार का विश्लेषण सुनने के बाद " स्वविवेक " का प्रयोग कर लेता था और परिणाम मिलता कि मैं सच के करीब पहुंच गया। 

सन् 2014 के बाद से अब तक रवीश कुमार को एकदम खुश कभी नहीं देख पाया , जैसे कि कल से आज तक रवीश इश्क में शहर होने के आशिक की तरह खुश नजर आ रहे हैं , एकदम ठहाके लगाकर हंसते हैं और बेहद सकारात्मक नजर आ रहे हैं।

मैंने ये खुशी रेमन मैग्ससे से सम्मानित होने के समय भी रवीश कुमार में नहीं देखी। उनके चेहरे मे तब भी नकारात्मक अवसाद तनिक झलक जाता था , जबकि अथाह पैसा और समर्थन मिलने के कारण से बहुत साफ नहीं झलकता था। चूंकि वे जो काम कर रहे हैं , उसका उनको सबकुछ मिल रहा है। 

अब ऐसा लग रहा है , जैसे दिल्ली मे केजरीवाल की जीत से यह मान लिया गया हो कि रवीश कुमार तुम्हारी मेहनत रंग लाई है। जैसे कि लगे रहो केजरीवाल की जगह कहा गया हो कि लगे रहो रवीश कुमार ! 

हालांकि केजरीवाल की जीत और रवीश कुमार के काम में कोई संबंध नहीं है। किन्तु बीजेपी का अपनी ही गलतियों से हारने और केजरीवाल की जीत में रवीश कुमार के प्राइम टाइम ने ईंधन का काम जरूर किया है। यही वजह है कि रवीश कुमार को ईधन की मान्यता मिली है और यही सफलता महसूस कर हजारों टन किलो लड्डू उनके मन मे फूट चुके हैं। 

सबसे बड़ी खुशी यही है कि रवीश कुमार खुश हैं और इस संसार मे सबका वक्त है , कम से कम रवीश कुमार को खुश होने का हक बनता है। जो खुशी रेमन मैग्ससे नहीं देता , वो खुशी बीजेपी की हार मे है। 

अब यह चुनावी राजनीति है। भाजपा जनता के मूड को और राज्य के मुद्दे को नहीं समझेगी तो उनकी हार निश्चित है। सबसे बड़ी वजह है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अपने जमीनी कार्यकर्ता को पं दीनदयाल उपाध्याय की ईमानदारी वाली घुट्टी पिलाता है और खुद मार्क्स के नियमों का पालन कर कोठियां भरते हैं , धन - संपदा से मालामाल होते हैं। 

भाजपा का शीर्ष नेतृत्व समस्त सुख भोग रहा है पर जनपदीय - गांव के कार्यकर्ता की थाने मे भी औकात नहीं है कि वह कोई जायज काम भी करवा सके। उत्तर प्रदेश मे हालत यह है कि स्थानांतरण और पोस्टिंग शीर्ष नेतृत्व द्वारा समाजवादी के शिवपाल सिंह यादव की तर्ज पर ही होता है , पर जनपद का कार्यकर्ता कुपोषित हो रहा है तो हो ! 

अब चिंतन की बात है कि कुपोषित सैनिकों से कोई युद्ध जीता जा सकता है क्या ? एक राजा कमजोर सैनिकों की सेना लेकर युद्ध जीतने की कल्पना कर सकता है क्या ? परंतु भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सांसद निधि , विधायक निधि और वेतन सहित तमाम सुख - सुविधा भोगते हुए कार्यकर्ता को चुनावी " फूड पैकेट " देकर चुनाव जीतना चाहता है। 

जबकि केजरीवाल ने अपने दल के कार्यकर्ता को एनकेन प्रकारेण लाभ पहुंचाया और अंतिम छः महीने में सरकारी शिक्षा के हालात बदले , बिजली मुफ्त - पानी मुफ्त से लेकर भाजपा की ही स्ट्रेटजी अपनाकर चुनाव जीत लिया। यही चुनावी जीत हासिल करने का फार्मूला भी है। 

यह भी तय है कि भारत जैसे विशाल देश में भाजपा हाल-फिलहाल देश मे उत्तम माहौल को प्राथमिकता देते नजर नहीं आई। 

यह तय है कि भाजपा अपनी कमी से वैसे ही हारी है , जैसे कांग्रेस ने अपनी कब्र स्वयं खोदी है। राजनीति मे हार अपनी कमियों से ही नसीब मे मिलती है। किन्तु कांग्रेस की अपेक्षा भाजपा मे अच्छा यह है कि समय रहते बदलाव करते हैं व सीखते हैं। इसलिये भाजपा फार्मूले में बदलाव कर सकती है। 

यह अलग बात है कि रवीश कुमार को ऊर्जा मिल गई है और ऐसा इसलिए कि उन्हें रेमन मैग्ससे मिला और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्विट करके भी शुभकामनाये नहीं दीं। यह दर्द प्राइम टाइम मे वे बयां कर चुके हैं कि चलिए प्रधानमंत्री आज एक वामपंथी से मिल लिए वैसे वे वामपंथियों से नहीं मिलते , ऐसा उस वक्त जब नरेन्द्र मोदी नोबेल पुरस्कार से सम्मानित वामपंथी से मिले थे। 

खैर भाजपा की चुनावी हार से खुश होना वाले , इंडियाटूडे के नाचने वाले राजदीप देसाई जैसे पत्रकार कम से कम अब यह तो ना कहें कि वे निष्पक्ष पत्रकार हैं। जनता जैसे भाजपा को हराती है , वैसे ही आपकी पत्रकारिता को भी समझती है। 

अंततः यही कि राजनीति हमेशा जनहित की हो और पत्रकारिता भी जनहित की हो , भारत अपने वास्तविक स्वरूप में विश्व मे परचम लहराए। 

रवीश कुमार को इश्क मे शहर होना वाले आशिक की आशिकाना मुस्कान मुबारक हो , खुशी है कि उनके चेहरे पर मुस्कान लौट आई। 

( ये लेखक के निजी विचार हैं )

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