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दीवारी, पाई डण्डा प्रतियोगिता में रमेश पाल की टीम ने बाजी मारी

बांदा,

नटराज संगीत महाविद्यालय में मण्ड़लीय सांस्कृतिक प्रतियोगिता-दीवारी, पाई डण्डा का आयोजन किया गया जिसमें कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। प्रतियोगिता में रमेश पाल की टीम ने प्रथम, चन्द्रपाल की टीम ने द्वितीय, अनिल की टीम ने तृतीय तथा लल्लू प्रसाद की टीम ने चतुर्थ स्थान प्राप्त किया।

इस अवसर पर अपर जिलाधिकारी (वि./रा.) संतोष बहादुर सिंह ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहाकि बुन्देलखण्ड़ की लोक कला दीवारी नृत्य ने न केवल देश अपितु विदेशों में भी अपनी खुशबू बिखेरी है। इस लोक कला से जुडे़ हुए कलाकार पूरी तन्मयता और लगन से जुड़कर इस कला को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि दीवारी नृत्य की उत्पत्ति द्वापर युग में भगवान कृष्ण के समय से हुई है तथा दीवारी नृत्य में युद्ध कला का प्रदर्शन भी किया जाता है। उन्होंने कहा कि यह नृत्य योद्धाओं के युद्ध कौशल पर आधारित है। सांस्कृतिक प्रतियोगिता में भाग लेने वाली सभी टीमों को अपर जिलाधिकारी ने बधाई देते हुए कहा कि उनकी कला का प्रदर्शन बहुत ही सराहनीय है।

उप निदेशक सूूचना भूपेन्द्र सिंह यादव ने कहा कि बुन्देलखण्ड़ की इस लोक कला को यहां के लोक कलाकार न केवल जिन्दा रखे हुए हैं अपितु इस कला को आगे बढा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा माना जाता है कि दीवारी नृत्य का उद्गम एवं विकास बुन्देलखण्ड़ के बांदा जनपद से हुआ है। श्री यादव ने कहा कि पाई डण्डा एवं दीवारी नृत्य में युद्ध के समय प्रयोग होने वाले वाद्य यंत्र नगाडा एवं उसका लघु रूप नगड़िया का प्रयोग होता है तथा पैर एवं कमर में घुंघरू की पाजेब एवं पेटी का प्रयोग होता है। उन्होंने बताया कि सांस्कृतिक प्रतियोगिता में रमेश पाल की टीम ने प्रथम, चन्द्रपाल की टीम ने द्वितीय, श्री अनिल की टीम ने तृतीय तथा लल्लू प्रसाद की टीम ने चतुर्थ स्थान प्राप्त किया।बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय बांदा के जनसम्पर्क अधिकारी प्रो0 वी.के.गुप्ता ने कहा कि यहां के कलाकार बधाई के पात्र हैं क्योंकि वे अपनी लोक कला को न केवल बचाए हुए हैं अपितु आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं।

सहायक अभियंता दूरदर्शन अजय शंकर त्रिपाठी ने इस अवसर पर अपने सम्बोधन में कहा कि इस कला में ऊर्जावान कलाकारों की प्रतिभा को देखने का अवसर मिलता है तथा यह कलाकार अगली पीढ़ी को भी अपनी कला से जोड़ रहे हैं यह बहुत ही सराहनीय है। डा. जनार्दन प्रसाद त्रिपाठी ने इस अवसर पर बोलते हुए कहा कि पाई डण्डा एवं दीवारी नृत्य संसार के सभी मार्शल आर्ट का जन्मदाता है। उन्होंने कहा कि इस नृत्य की पूरी प्रक्रिया में एकाग्रता एवं सन्तुलन की आवश्यकता होती है तथा इसकी तुलना शिव के ताण्डव नृत्य से की जा सकती है।कार्यक्रम का संचालन नटराज संगीत महाविद्यालय के प्रबन्धक धनंजय सिंह ने किया। इस अवसर पर दूरदर्शन के सजल कुमार, जिला प्रतिनिधि यू.एन.आई. दिनेश कुमार मिश्र उर्फ सुमन तथा दीवारी नृत्य से जुडे हुए कलाकार, बुद्धिजीवी व नागरिक उपस्थित रहे।

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