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‘आध्यात्म, दर्शन, प्राचीन संस्कृति को बनाए पथ प्रदर्शक’

@ राजकुमार याज्ञिक, चित्रकूट

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन

गोस्वामी तुलसीदास राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्राचाीन भारतीय समाजिक संस्थाएँ एवं वर्तमान में उनकी प्रासांगिकता विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र का शुभारम्भ मुख्य अतिथि कामद्गिरि के महन्त मदन गोपाल दास महाराज एवं महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ राजेश कुमार पाल ने माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण व दीप प्रज्ज्वलित कर किया। मंच पर विशिष्ट अतिथि महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्व विद्यालय के डाॅ आरसी त्रिपाठी, डाॅ राजेश त्रिपाठी, सर्वोदय सेवा आश्रम के अभिमन्यु सिंह उपस्थित रहे। 

मुख्य अतिथि महन्त मदनगोपाल दास ने कहा कि प्राचीन भारत संसार में विश्वगुरु के रूप में जाना जाता था जो प्राचीन शिक्षा पद्धति, धार्मिक व आध्यात्मिक संस्कृति पारिवारिक संस्कार, दर्शन एवं नैतिक मूल्यों की देन थी, किन्तु आज का भारतीय अपने प्राचीन संस्कृतियों, संस्कारों, मूल्यों से दूर होता जा रहा है। इसलिए उन्होंने प्राचीन धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कृति और दर्शन को वैज्ञानिकता, नैतिक मूल्यों से जोड़ने पर बल दिया। भारतीय संस्कृति एवं आध्यात्मिकता के गौरवपूर्ण महत्व को बताते हुए धार्मिक ग्रंथों, नैतिक शिक्षा, दर्शन आदि तत्वों को पथ प्रदर्शक बनाने पर जोर दिया।

संगोष्ठी में आये अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ राजेश कुमार पाल ने कहा कि आज समाज की संस्थाएँ वास्तव में खतरे पर हैं जो वेहद चिन्तजनक है। मनुष्य आधुनिकता की चकाचैंध से इस प्रकार प्रभावित है कि उसके सम्मुख परिवार, संस्कार, समाज, नैतिक मूल्य, धर्म, दर्शन का कोई महत्व नहीं रह गया। इसलिए यह तय करना होगा कि अपना पथ प्रदर्शक आध्यात्म, दर्शन, प्राचीन संस्कृति को बनायें अथवा उपभोक्तावादी संस्कृति को।

इसके पूर्व तृतीय तकनीकी सत्र में सीएमपी डिग्री कालेज के डाॅ चिरन्जीव एवं महाविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापक डाॅ रामनरेश यादव, सह समन्वयक डाॅ अमित कुमार सिंह, डाॅ सीमा कुमारी, डाॅ मुकेश कुमार, डाॅ अतुल कुमार कुशवाहा, डाॅ धमेन्द्र सिंह, डाॅ राकेश कुमार शर्मा, डाॅ नीरज गुप्ता आदि ने विषयानुकूल व्याख्या की। संचालन समारोहक डाॅ वंशगोपाल ने किया। संगोष्ठी में दूरदराज से आये शोध छात्रों ने शोध पत्र प्रस्तुत किये। इस अवसर डाॅ बलवन्त सिंह राजौदिया, छात्र, छात्राएँ व कर्मचारीगण उपस्थित रहे।
 

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