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प्रयोग शास्त्र है रामचरित मानस: श्रीकांत

@राजकुमार याज्ञिक, चित्रकूट

श्रीराम कथा के पांचवे दिन राम वनगमन का वर्णन

भगवान राम की तपस्थली चित्रकूट के प्रमोद स्थित दास हनुमान मंदिर में चल रही रामकथा के पांचवें दिन कलकत्ता से रामकथा रुपी अमृत बरसाने आए कथा व्यास पंडित श्रीकांत शर्मा ने कैकेयी कोप, राम वन गमन व केवट प्रसंगों की कथा सुनाई।

कथा प्रारंभ करते हुए व्यास ने राम के रूप का वर्णन करते हुए बताया कि कृष्ण बहुत सुंदर थे। उन्होंने गोपियों को मोहा, लेकिन राम की सुंदरता ऐसी थी कि उन्होंने पुरुषों को भी मोह लिया। राम के रूप पर जनक मोहित हो गए। रावण ने राम से युद्ध के समय जब पहली बार उनके रूप को देखा तो वह मंदोदरी से कहता है कि मंदोदरी मैं राम से आंख नहीं मिलाता, कहीं उसका रूप मुझे डुबा न दे। खर दूषण राम के रूप में इतना मोहित है कि वह कहता है कि भले ही इन्होंने सूर्पनखा की नाक कान काटे लेकिन ये वध लायक नहीं है। राम में रूप, बल और शील सज्जनता तीनों हैं, लेकिन रावण में दारुण था और न सज्जनता थी। उसके पास केवल बल था।

राम ने रूप के द्वारा सारे जगत को जीता और बल के द्वारा रावण को जीता तथा शील के कारण उन्होंने परशुराम को जीता। परशुराम के पास रूप और बल दोनों थे लेकिन सज्जनता नहीं थी। कथा व्यास ने अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर कहा कि दुनिया क्या राम जी का फैसला करेगी। रामजी ही राम का फैसला कर सकते हैं। राम ने ही राम पर बैठकर फैसला कर दिया। भगवान राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न के विवाह का सुंदर दर्शन कराते हुए कथा व्यास श्रीकांत शर्मा ने कहा कि अयोध्या और जनकपुर के हर घर में आनंद ही आनंद छा गया। कैकई ने सीता जी को मुंह दिखाई के रूप में कनक भवन दिया। राम विवाह के बाद राजा दशरथ के घर में सुखों की बरसात होने लगी। रिद्धि सिद्धि संपदा अयोध्या के हर घर में उमड़ घुमड़ कर आने लगी। अयोध्या का नाम पूरे संसार में हो गया। उस जमाने में अयोध्या धन धान्य से परिपूरित थी।

राम विवाह की मनोहर कथा सुनाने के बाद कथा व्यास श्रीकांत शर्मा ने कहा कि राम के राज्याभिषेक की तैयारियों के बीच में अचानक कैकेयी द्वारा दशरथ से दो वरदान मांगने से एकाएक अयोध्या में सब कुछ परिवर्तित हो गया। राम को राज्याभिषेक के बदले दशरथ ने 14 वर्ष का वनवास सुना दिया और पिता की आज्ञा को सर्वोपरि मानकर राम, लक्ष्मण व सीता वल्कल वस्त्र पहनकर अयोध्या के राज महल से निकल वन की ओर चल दिए। वनवास पर निकले राम जब गंगा तट पर आए तो केवट ने उन्हें अपनी नौका से नदी पार कराई। गंगा पार करने के बाद भगवान भारद्वाज ऋषि के पास पहुंचे और भरद्वाज ऋषि की आज्ञा से वह चित्रकूट में महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुंचे। भगवान राम, लक्ष्मण और सीता के वनगमन की कथा सुनकर काशी से आये कथा आयोजक संजय कनौरिया, मुदित कनौरिया परिवार सहित कथा में आये श्रद्धालु भक्ति रस में डुबकी लगाते रहे।  
 

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