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जल जमाव से फसलों को बचाना अति आवश्यक है-कृषि वैज्ञानिक

बांदा, 

बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, बांदा के कृषि वैज्ञानिकों द्वारा बुन्देलखण्ड के किसानों को समय-समय पर कृषि सम्बन्धी जानकारियां एवं सलाह दिया जाता है। इसी क्रम में सितम्बर माह के द्वितीय पखवारे में किसानों को फसलों हेतु महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना चाहिये।

सभी कृषक भाईयों को यह सलाह दी जाती है कि वह अपने खेत में खड़ी कड़ी फसल मे अत्यधिक जल जमाव से होने वाले नुकसान के लिये जल निकासी का उचित प्रबन्ध समय रहते कर ले। जल जमाव क स्थिति में पौधे कमजोर हो सकते है जिससे उत्पादन पर असर पडता है। प्रमुख रूप से सब्जी वाले फसलों में नुकसान और भी बढ़ जाता है। खरीफ फसलों में खरपतवार प्रबंधन के साथ अनुसंक्षित कीट व फफूंद नाशियों का छिड़काव करें। बैंगन, टमाटर व मिर्च की तैयार पौध का रोपण तैयार खेतों या मेडों पर करें। शरद ऋतु में सब्जी से अधिक मुनाफा देने वाली अगेती फूलगोभी, पत्तागोभी का भी रोपण तैयार खेतों में करें। पालक, मेंथी मूली, गाजर, सब्जी मटर तथा अन्य अगेती रबी फसलों के खेत की तैयारी कर लें तथा मौसम के अनुरूप द्वितीय पखवाड़े में बुआई भी कर दें।

उर्द व मूंग की फसल में पीला मोजैक रोग के लक्षण दिखाई देने पर नियंत्रण हेतु रोग कारक विषाणु को फैलाने वाली मक्खी के रोकथाम हेतु डाईमेथोएट 1 मिली प्रति लीटर पानी अथवा इमिडाक्लोप्रिड 3 मिली प्रति 10 लीटर पानी की दर से छिड़काव करें। प्रथम छिड़काव रोग के लक्षण दिखाई देने पर करें, द्वितीय छिड़काव बुवाई के 45 दिनों बाद करें। धान की फसल में आच्छद झुलसा (सीत ब्लाइट) के लक्षण दिखाई देने पर इस रोग के नियंत्रण हेतु एजोस्ट्रोविन अथवा कार्बेण्डाजिम 01 ग्राम प्रति मीटर पानी अथवा वैलीडामाइसीन 2.5 मिली पानी की दर से छिड़काव करें, तथा 15 दिन के अन्तराल पर दोबारा छिड़काव करें। खेत में ज्यादा दिन तक जल भराव न होने दें।

मिर्च की फसल में पत्ती मरोड़ विषाणु रोग के नियंत्रण हेतु प्रारम्भिक अवस्था में रोगी पौधे को उखाड़कर जमीन में दबा देना चाहिए तथा रोग कारक विषाणु को फैलाने वाले कीट के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रिड 3 मिली प्रति 10 ली0 पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें, तथा 15 दिन के अन्तराल पर दोबारा छिड़काव करें। तिल में फाइलोडी रोग के लक्षण दिखाई देने पर रोग ग्रसित पौधे को देखते ही नष्ट कर देना चाहिए, तथा रोग कारक फाइटोप्लाजमा को फैलाने वाले कीट के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रिड 3 मिली प्रति 10 ली0 पानी में घोलबनाकर छिड़काव करें, तथा 15 दिन के अन्तराल पर दोबारा छिड़काव करें।

वानिकी महत्व के फसलों के अगस्त माह में जिन पाॅलीथीन थैलियो में बीज अंकुरित नहीं हुए हैं अथवा कमजोर पौध को स्वस्थ व विकसित पौध से प्रति स्थापित। प्रत्यारोपित करें। वानिकी पौधशाला को खरपतवार से मुक्त रखने तथा जल निकासी नालियो। चैनलों को साफ रखने की सलाह दी जाती है। पूर्व रोपित पौधों की निराई-गुडाई करें तथा साथ ही साथ उजागर जड़ों को पुनः मिट्टी से आच्छादित करें। जुलाई माह में रोपित पौध, जो कि मृत हो गए हैं। स्वस्थ्य पौधों से प्रत्यारोपित करें। पशुपालकों को इस समय रोगों से बचाव हेतु पशुओं का टीकाकरण अवश्य कराना चाहिये। रोग न फैल सके इसके लिये साफ-सफाई व परजीवियों की रोकथाम हेतु कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग करना चाहिये। 

पशुपालकों को रोग ग्रसित पशु को स्वस्थ्य पशु से अलग कर पशु चिकित्सक द्वारा उपचार कराना चाहिए इस मौसम में पशुओं को बाहर भेजने से पहले भरपेट पानी पिला के ही बाहर भेजना चाहिए जिससे वे गढ़डे, तालाब, पोखर इत्यादि में भरा प्रदूषित जल न पी सकें एवं उनका बचाव कई प्रदूषित पानी वाले रोगों से हो सके।
 

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