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तुम्हे बनाते वक्त शायद ईश्वर तुम्हे अक्ल देना भूल गया ? 

यदि आप अपने बचपन को याद करेंगे तो उस शिक्षक की बोलती हुई तस्वीर साफ झलकने लगेगी, जिसने बचपन में भरी कक्षा में कोई ना कोई ताना अवश्य मारा होगा। सहपाठियों के सामने मासूम मन को बेइज्जत किया होगा। जिसका बहुत बड़ा फर्क पठन - पाठन में अवश्य पड़ता है। संभवतः अब आप अभिभावक हो चुके होगें तो स्कूल का चुनाव करने के समय बिल्डिंग देख रहे हैं या फिर स्कूल में पढ़ाना वाले शिक्षकों की गुणवत्ता देख रहे हैं ? यह सवाल प्रत्येक अभिभावक से है चूंकि स्कूल की बिल्डिंग ब्लैक मनी को व्हाइट मनी बनाने के लिए भी खूबसूरत बन जाती है परंतु स्कूल की शिक्षा जीवन भर का प्रभाव छोड़ती है। एक बार अपने बचपन में अवश्य झांककर महसूस करिए फिर अंदाजा लगाइए कि कोई मात्र डिग्रीधारी अल्पज्ञानी शिक्षक आपके बच्चे को कोई ताना तो नहीं मार रहा ? 

 

हाँ अभिभावकों को बच्चों से मनुहार करके सतत जानकारी लेने की जरूरत है कि कभी किसी शिक्षक ने बालमन में बुरा शाब्दिक प्रहार तो नहीं किया ! असल में तमाम शिक्षक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से अनजान होते हैं और वर्तमान शिक्षा पद्धति में मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण लुप्तप्राय हो चुका है। इसलिये अभिभावकों की सजगता प्रमुख हो जाती है।

 

बच्चों को जन्म दे देना और स्कूल भेज देना ही मात्र आपका कर्तव्य नहीं है। बल्कि समय-समय पर मनोवैज्ञानिक रूप से बच्चों की काउंसलिंग होना बेहद जरूरी है, यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा सफल जीवन जिए ! 

 

एक बार एक शिक्षक ने अपने शिष्य को तनिक से गुस्से में यह कह दिया कि तुम्हे बनाते वक्त शायद ईश्वर तुम्हे अक्ल देना भूल गए। इस बात का बहुत बुरा असर उसके मन पर पड़ा और सचमुच जीवन के 33वें वर्ष वह छात्र अपनी कमअक्ल से परेशान होता रहा, एक लंबा संघर्ष किया। 

 

किन्तु इत्तेफाक से 34 वें वर्ष में एक मनोविज्ञान के जानकार से उसकी मुलाकात होती है। वह मनोवैज्ञानिक उससे गहन चर्चा करता है। उसने उसकी छुपी हुई प्रतिभा को पहचान लिया था। बातों के दरम्यान उस शख्स ने बचपन की शिक्षक द्वारा कही बात उस इंसान से साझा कर दिया।

 

मनोवैज्ञानिक ने उसके मन - मस्तिष्क को अच्छी सोच से भरना शुरू किया। उसे महसूस कराया कि तुम बहुत प्रतिभावान इंसान हो और जो वाक्य शिक्षक ने बोला था, उसे एक कागज में लिखवाकर उसी शख्स से जलवाकर फिंकवा दिया। इस तरह से उसके मन से कमअक्ल वाली बात निकल गई। 

 

वह शख्स एक अच्छा जीवन जीने लगा। अपनी बुद्धि - विवेक की शक्ति से उसने खूब समृद्धि हासिल की ! उसकी जिंदगी में महज इत्तेफाक से अच्छा हो गया परंतु यह जिम्मेदारी अभिभावकों की है कि बच्चों पर नजर रखें, उनसे खुलकर बाते करें। हो सकता है आपका बच्चा किसी शिक्षक द्वारा कही हुई ऐसी ही कोई बात बता दे जो उसे शिक्षक बनने अहर्ता से बाहर का रास्ता दिखाती हो अथवा संभव है कि चमकदार बिल्डिंग का पूरा संस्थान शिक्षण संस्थान के लायक ना हो। अतः यह दौर अभिभावक जागरूकता का है और अभिभावक बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए स्कूल से संबंधित चर्चा बच्चों से अवश्य करें। 

About the Reporter

  • सौरभ चन्द्र द्विवेदी

    समाचार विश्लेषक के रूप में बुन्देलखण्ड के मुद्दों पर पैनी नजर रखने में माहिर हैं सौरभ द्विवेदी। विगत 10 वर्षों से भी अधिक समय से पत्रकारिता से जुड़े रहकर समाज व राजनीति पर सैकड़ों लेख लिखे और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुए।, स्नातक

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