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एक शिक्षिका का पत्र डीएम बाँदा के नाम

डीएम साहब द्वारा अंग्रेजी माध्यम की भर्ती पर की गई कार्यवाही काबिले तारीफ है। उन्होंने बेसिक शिक्षा व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने वालों पर कड़ा प्रहार किया है। अंग्रेजी माध्यम में चल रही भर्ती के विषय में कुछ बातें कहना चाहती हूं। डीएम साहब ने भर्ती को बहुत कुछ सोचने समझने के बाद निरस्त किया है। आखिरकार हुई गड़बड़ी सबने देखी पर विरोध केवल दो लोगों ने किया। डीएम साहब के आफिस में तैनात ओएसडी खरे बाबूजी की करीबी रिश्तेदार खरे मैडम एवं आलोक यादव जी ने। इनका मैं धन्यवाद करती हूं, जो इन्होंने सच्चाई के लिए लड़ाई लड़ी। 
आखिर इस भर्ती परीक्षा में कमी कहां रह गई? सबसे बड़ी कमी तो यह थी कि जीआईसी स्कूल में रिटेन परीक्षा में अध्यापकों ने सीसीटीवी कैमरे की निगरानी में भी जमकर आपस में पूछताछ एवं नकल की। अंग्रेजी का कम ज्ञान रखने वाले आसानी से पास होकर मेरिट में ऊपर आ गए। दूसरी गलती तब हुई जब इंटरव्यू में सीसीटीवी कैमरे की निगरानी में भी पेंसिल से नंबर दिए गए। 

डीएम साहब, लिखित परीक्षा और इंटरव्यू की सीसीटीवी फुटेज देखकर नेता बने रहे कई ईमानदार टीचर बनने वाले लोगों पर कार्यवाही कर सकते हैं। यदि कोई टीचर कहता है कि वह बहुत होशियार है तो डीएम साहब अपने सामने उस टीचर से मौके पर ही अंग्रेजी की किताब पढ़वा कर व उसका इंटरव्यू लेकर अंग्रेजी के ज्ञान की हकीकत देख सकते हैं। और यदि डीएम साहब द्वारा पूछे गए सवालों के उत्तर देने में कोई कमी रह गई तो तत्काल उसे वहीं मौके पर सजा भी दे सकते हैं। यदि कोई कहता है कि सीसीटीवी कैमरे की फुटेज डिलीट हो गई है तो साफ समझ में आता है कि धांधली को छुपाया जा रहा है। आखिर इतनी बड़ी परीक्षा की सीसीटीवी फुटेज कैसे डिलीट हो सकती है? इसी आधार पर परीक्षा निरस्त करने का डीएम साहब को पावर है। दूसरी गलती यह हुई कि जब लिखित परीक्षा में टीचर पास या फेल हो रहे हैं तो उनके रिजल्ट के साथ लिखित परीक्षा के नंबर टीचर को क्यों नहीं बताए गए? इंटरव्यू में मिले नंबर भी क्यों नहीं अलग से बताए गए? दोनों नंबरों को जोड़कर बताने का मतलब क्या था? शायद मतलब यह था कि टीचर कंफ्यूज रहे कि उसको लिखित परीक्षा में कम या ज्यादा नंबर मिले हैं कि इंटरव्यू में कम या ज्यादा नंबर मिले हैं। 

हाई कोर्ट में जाने की बात करने वाले लोगों की लिखित परीक्षा की काॅपी और सीसीटीवी फुटेज जिसमें नकल हुई, जब उच्च अधिकारी हाईकोर्ट में रखेंगे तो हाईकोर्ट ऐसे नेता बन रहे नकलची अध्यापकों को नकल करने व कराने में बर्खास्त भी कर सकता है। और रही बात नियम कानूनों की, तो अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय के अध्यापक को लिखित परीक्षा पास करने पर वहीं पर तैनाती मिलनी चाहिए थी और बेसिक शिक्षा नियमावली में प्रावधान यह नियम कि काउंसलिंग में महिलाओं को वरीयता प्रदान किया जाना चाहिए था, जैसा कि अन्य जिलों में भी हो रहा है। नेतागिरी करके चंदा इकट्ठा करके हाई कोर्ट जाने की बात सोचने वाले और फंस ही जाएंगे, क्योंकि जब परीक्षा रूम की लिखित परीक्षा की काॅपी निकलेगी तब पता चलेगा कि आसपास के अध्यापक एक जैसा काॅपी में लिखे हुए हैं। अगर अपने आप को इतना ही योग्य मानते हैं तो अगली बार लिखित परीक्षा देने में क्या दिक्कत है। योग्यता कभी किसी की मोहताज नहीं होती न ही छुपती है। लिखित परीक्षा दोबारा दे दीजिए और देख लीजिए कि कौन कितने पानी में है। यदि आप योग्य होंगे तो दोबारा परीक्षा में टाॅप करते हुए मनचाहा विद्यालय पाएंगे। हाईकोर्ट जाकर न स्वयं सिलेक्ट होंगे और ना ही दूसरों को सिलेक्ट होने देंगे क्योंकि हाईकोर्ट के मुकदमे सब जानते हैं, कितने साल चलते हैं और तब तक न जाने कितनी अंग्रेजी की परीक्षाएं हो चुकी होंगी और केस करने वाले लोग ही न जाने कहां-कहां सिलेक्ट होकर चले गए होंगे। डीएम साहब की ईमानदारी व त्वरित निर्णय लेने के लिए उनको पुनः धन्यवाद।

- एक अन्जान शिक्षिका

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