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दोषी और निर्दोष के बीच का बड़ा महीन अंतर ; समझिए

वो इलाहाबाद युनिवर्सिटी का छात्र था। अस्सी - नब्बे का दशक था। वो पढ़ रहा था कि शिक्षित होकर प्रशासनिक सेवा के क्षेत्र में जाएगा। किन्तु वक्त और नसीब कुछ और ही कहता था। 

 

उसके खेत में एक शव फेंक दिया जाता है। खेत स्वामी के बेटे पर हत्या का इल्जाम लगाया जाता है। वो छात्र निर्दोष था , इसलिए तत्काल हाजिर नहीं हो सकता था। पुलिस उसे गिरफ्तार करने से नाकाम थी। 

 

किन्तु पुलिस ने घर में कुर्की कर ली। उस घर में खाने - पीने को कुछ नहीं बचा। पुलिस साजिशन एनकाउंटर भी कर देना चाहती थी। इसलिए आरोपी छात्र नाटकीय तरीके से जज के सामने हाजिर हुआ।

 

कोर्ट में मुकदमा चलता है। बचाव पक्ष के वकील ने गवाह से फिल्मी तरीके से पूछताछ की ! 

 

वकील ने कोर्ट रूम में अंधेरा कराया। गवाह से कहा कि पहचानों ? गवाह पहचानने में नाकाम रहा। तत्पश्चात वकील ने कहा कि इतने ही अंधेरे में घने पेड़ पर बैठे हुए आरोपी कैसे पहचान लिया था ? 

 

अब मामला साफ हो चुका था। अन्य सबूत भी बचाव पक्ष के पास थे। इस एक मामले पर बरी तो हो गए। किन्तु उसके बाद दुश्मनी का एक लंबा सिलसिला चला। 

 

समझने योग्य है कि पुलिस की चार्ज सीट के मुताबिक आरोपी ही दोषी था। अगर कुछ सबूत और वकील की बुद्धिमत्ता काम नहीं आती तो आरोपी ही दोषी होता और कोर्ट उसको सजा सुनाता।

 

ये दोषी और निर्दोष के बीच का बड़ा महीन अंतर है। यह हकीकत की कहानी मेरे ही बड़े पापा अभिमन्यु द्विवेदी की है। जिसकी पटकथा अलग है पर इक्कीसवीं सदी में कठुआ मामले पर विशाल जंगोत्रा को फंसाने की साजिश की तरह है। 

 

इसलिये स्वविवेक और दृष्टि का प्रयोग होना चाहिए। कोर्ट चार्ज सीट और सबूत के आधार पर सजा सुनाता है। निर्दोष वही साबित हो पाता है जिसके पास बचाव के सबूत और कुछ विशेष कारण किस्मत से मिल जाते हैं। इसलिये विशाल जंगोत्रा को किस्मत का धनी मानिए। 

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