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वृक्षों के मामले में स्थिति बिगड़ी- कट रहे वट वृक्ष, तप रही धरती

वट वृक्ष और सावित्री एक दूसरे के पूरक हो गए। जेठ की अमावस्या पर बरगद की पूजा होती आ रही है। वट वृक्ष के नीचे ही सावित्री को अपना सुहाग वापस मिला था। बुंदेलखंड में इस पूजा का महत्व यहां के जीवन चक्र से जुड़ चुका है। यदि धरती को बचाना है तो बरगद व पीपल के अधिक से अधिक वृक्ष लगाने होंगे। चुकी है। बड़ी-बड़ी चौड़ी सड़कों के निर्माण से विकास को तो गति मिली लेकिन इन सड़कों का निर्माण लोगों के लिए आत्मघाती सिद्ध हो रहा है। सड़क के दोनों छोर पर दूर-दूर तक छाया का नामोनिशान नहीं दिखाई देता है। जिस गति से वृक्ष खत्म हो रहे हैं, इससे भूगर्भ जलस्तर तेजी से गिर रहा है।

पीपल, बरगद के वृक्ष अन्य की अपेक्षा विशाल होते हैं। इन्हें पानी, ऋतु आदि की बहुत जरुरत नहीं पड़ती। इन पेड़ों को नुकसान पहुंचने का मतलब है मानव जीवन को नुकसान पहुंचना। भगवान का बताया जाता निवास कहावत है कि पीपल में ब्रह्म देव व बरगद में भगवान भैरों का निवास रहता है। इसलिए देवताओं का वास मानकर वृक्षों की पूजा की जाती है। धर्मग्रंथों में भी उल्लेख मिलता है कि पीपल के पत्तों में देवी देवता वास करते हैं। इसे ऋषि, मुनियों की दूरदृष्टि ही कहेंगे कि उन्हें आने वाले समय की परेशानियां पता थीं। शायद इसी के चलते उन्होंने इन वृक्षों को धार्मिक महत्व से जोड़ दिया, ताकि ये संरक्षित रहें।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी बहुत महत्व

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी पीपल व बरगद के वृक्ष अन्य की अपेक्षा सर्वाधिक ऑक्सीजन देते हैं। बारिश में दोनों ही वृक्ष अपनी जड़ों से वर्षा का जल भी सर्वाधिक संरक्षित करते हैं। न चेते तो बन जाएगा रेगिस्तान जिस तेजी से वृक्षों और जंगलों का सफाया हो रहा है, वह दिन दूर नहीं जब बुंदेलखंड रेगिस्तान में तब्दील हो जाएगा। वैसे भी बुंदेलखंड में अरसे से पानी की समस्या है।

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