< उम्मीदों के कवि जयकांत शर्मा का निधन Hindi News - Breaking News, Latest News in Hindi, हिंदी में समाचार, Samachar - Bundelkhand News जनपद के अमर कवि केदारनाथ अग्रवाल की संगत व उनकी कविता में अनुस्य"/>

उम्मीदों के कवि जयकांत शर्मा का निधन

जनपद के अमर कवि केदारनाथ अग्रवाल की संगत व उनकी कविता में अनुस्यूत कला के प्रति अत्याधिक लगाव से शहर के कवि जय कांत शर्मा ने अपनी कविताओं में केदार की भाव भंगिमा से भर दिया ,तभी तो उन्हें आधुनिक कविता में आगे बढ़ने का मौका मिला।

उनका यह सफर प्रथम और आखरी कविता संग्रह घुटनोपर चलती उम्मीद की किरण पर समाप्त हो गया। उन्हें बीती रात  काल के क्रूरहाथों ने हमेशा हमेशा के लिए छीन लिया।बांदा में जनवादी लेखक मंच के वरिष्ठ सदस्य जय कांत शर्मा का जन्म 27 अक्टूबर 1952 में हुआ था ।

वे उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारी थे ,जन सेवा, समाज सेवा के अलावा उन्होंने साहित्यिक सेवा भी की। मुक्ति चक, बुंदेलखंड कनेक्ट, लोकोदय, महक जैसी पत्रिकाओं में अपनी कविताओं के माध्यम से बहुत ही जल्दी ही उन्होंने लोकप्रियता  हासिल कर ली।

उनके करीबी रहे लेखक व वरिष्ठ आलोचक उमाशंकर परमार बताते हैं कि श्री शर्मा की बीमारी के बारे में जब मुझे पता चला तो मैंने 2018 में उनके कविता संग्रह घुटनों पर चलती उम्मीद की किरण को बहुत जल्दी ही प्रकाशित करने पर जोर दिया जिसमें सफलता भी मिली।

उमाशंकर परमार बताते हैं कि जय कांत शर्मा एक पुरुष होकर भी स्त्रीवाद के प्रति संवेदनशील कवि थे। मगर वह पुरुष होने के पूर्व जीवन के प्रति संवेदनशील कवि भी है। कविता व्यक्ति को मानवीय बनाती है। जाहिर है जो भी जीवन के प्रति सकारात्मक होगा वह मानवीय होगा।

जयकांत की स्त्रीवादी कविताएं आधुनिक पाश्चात्य कामुक नारीवाद के विरुद्ध लोक की श्रमशील स्त्री के सेवक व वात्सल्य पूर्ण स्त्री के पक्ष में प्रगतिशील बयान है। जयकांत की पचीसों कविताओं में स्त्री है। उनकी कविताओं में दर्ज स्त्री अभिजात्य नहीं है वह कर्मशील वर्ग की आम स्त्री हैं वह स्त्री सौंदर्य और उसकी अस्मिता उसके श्रम से तय करते हैं यह एक नया हस्तक्षेप है।

फिरही एक ऐसी कविता है केव फिरही ही नहीं बल्कि महाभोज, हक का हिस्सा, सत्यवती, एक की गीता, बिट्टू, आशा बाई, मदर टेरेसा जैसी स्त्री की समुचित भागीदारी व हक की बात उठाती हुई तमाम संस्थाओं व संपत्ति से उनके विस्थापन के खिलाफ अस्मिता के पक्ष में बड़ी आत्मीयता से बात करती है।

जयकांत शर्मा की जिन कविताओं में अस्मिता के सवालों व आत्मीयता का विधान है उन्हीं कविताओं में लोकचरित्र की साफ-सुथरी समझ भी दिखाई पड़ती है। विधागत चरित्र सृजन यदि देखा जाए तो कहानी और उपन्यासो का शिल्प चरित्रगत होता है।

मगर कविता में चरित्रों का सृजन करना तथा उसकी परिस्थिति को तार्किक सांस्कृतिक आयामों के साथ अभिव्यंजित करना कठिन बात है। यह अनुप्रयोग लोकधर्मी कवियों की विशिष्टता है। केदार, त्रिलोचन, नागार्जुन, विजेंद्र, मान बहादुर सिंह, भगवत रावत जैसे कवियों की पहचान उनकी कविता में रहने वाले चरित्र ही हैं।

वीरेन दा का राम सिंह, मानबहादुर सिंह का नगीना, विजेंद्र का मुर्दे वाला सीना ऐसे चरित्र हैं जिनका विकल्प कविता छोड़िए कहानियों में भी नहीं है। जयकांत की कविताओं में उपस्थित चरित्र इसी लोकधर्मी रीति का नैरन्तर्य अभिव्यक्त करते है। विशेषकर स्त्री चरित्र को लेकर बेहद व्यवहारिक एवं संवेदनशील हैं।

मां से लेकर कामवाली बाई पर लिखी कविताओं में उनकी इस प्रतिभा की रचनात्मकता विलक्षणता देखी जा सकती है। जयकांत शर्मा का आशावाद व उम्मीद अस्मिताओं के पक्ष में आधुनिक व तार्किक विकल्प देता है।

आशावाद का यह वैचारिक पक्ष उनको न केवल कवि बनाता है बल्कि अंत तक कवि बनाए रखने की जिद भी करता है। जयकांत की संवेदनजन्य भाषा उस भाषा कुलीन के खिलाफ है जहाँ मानवीय मूल्यों को जाति लिंग धर्म की संकुचित परिधि में फींचकर नापा जाता है।
 

About the Reporter

अन्य खबर

चर्चित खबरें