< कुमार अंबुज का मनुष्‍यता के प्रति यह एक निर्णायक का समय है Hindi News - Breaking News, Latest News in Hindi, हिंदी में समाचार, Samachar - Bundelkhand News यह कुमार अंबुज की 'कोई है माँजता हुआ मुझे' शीर्षक वाली कविता क"/>

कुमार अंबुज का मनुष्‍यता के प्रति यह एक निर्णायक का समय है

यह कुमार अंबुज की 'कोई है माँजता हुआ मुझे' शीर्षक वाली कविता की चंद शुरुआती पंक्तियां हैं।वह हमारे समय के उन चुनिंदा प्रभावी कवियों में से हैं, जिनमें मानवीय सरोकार और संवेदना समूची शिद्दत से, बेहद निडरता और करुणा के साथ प्रवाहित होती है। वह लिखते हैं, और शब्द कविता का रूप धर लेते हैं, और झांकने लगता है उनमें हमारा समाज, संदर्भ सहित. आज उनका जन्मदिन है।कुमार अंबुज का जन्म 13 अप्रैल, 1957 को मध्य प्रदेश के गुना में हुआ था। 13 अप्रैल यानी बैसाखी का दिन। उत्तर भारत में यह सर्दियों की फसल कटने के बाद नए साल की खुशियां मनाने का दिन है। यह दिन रबी की फसल के पकने की खुशी का प्रतीक भी है। संभवतः कुमार अंबुज की कविताओं में खेतखलिहान, मजदूर, किसान, श्रम, औरतें, मध्यवर्ग, प्रकृति, करुणा, क्रूरता, उपकार और उम्मीदें उनके जन्म की तारीख के साथ ही आ गए।हालांकि उन्होंने जो कुछ लिखा या लिख रहे उनमें उनका अपना पाठ्य, अनुभव व समय शामिल है। अनुभवों की आग में तप कर, अपने परिवेश से वह अपनी कविताओं के लिए शब्द यों चुनते हैं कि पाठक भाव प्रवाह में आकंठ डूब जाता है। 'एक स्त्री पर कीजिए विश्वास' 

कोई अचरज नहीं कि जब साल 1998 में उनका संकलन 'अनंतिम' आया तो उसकी भूमिका लिखते हुए विष्णु खरे ने लिखा था- 'अनंतिम किसी ने कहा था कि दुनिया के मज़दूरो, एक हो जाओ - खोने के लिए तुम्हारे पास अपनी ज़ंजीरों के अलावा कुछ भी नहीं है। कुमार अंबुज की ‘ज़ंजीरें’ उन असंख्य साँकलों का जिक्र करती हैं, जिनसे हमारा समूचा चिंतन, सृजन तथा समाज बँधा हुआ है और उन्हें वंदनीय मानने लगा है, हालाँकि कुछ लोग आखिर ऐसे भी थे जो अपनी-अपनी आरियाँ लेकर उन्हें काटते थे और बार-बार कुछ आज़ाद जगहें बनाते थे। स्वयं कुमार अंबुज के कवि के लिए यह एक उपयुक्त रूपक है। उनकी कविताओं में कोई असंभव, हास्यास्पद आशावाद या क्रांतिकारिता नहीं है।

कुमार अंबुज को काव्य लेखन के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, श्रीकांत वर्मा सम्मान, केदार सम्मान, वागीश्वरी पुरस्कार, माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार, गिरजाकुमार माथुर सम्मान मिल चुका है और 'किवाड़', 'क्रूरता', 'अनंतिम', 'अतिक्रमण', 'अमीरी रेखा' नाम से कविता संग्रह आ चुके हैं. उन्होंने 'इच्छाएँ' नाम से कहानी संग्रह भी लिखा है।उनकी कविताओं में अन्याय का विरोध है, तो अपने समय का खाका भी। शायद इसीलिए उनमें ताज़गी और सहजता तो है, पर कथित बौद्धिकता और कृत्रिम वैचारिकता नदारद हैं। स्वयं कुमार अंबुज ने एक बार नए कवियों को संबोधित करते हुए कहा था कि कवि का वैज्ञानिक चेतना से लैस होना सबसे अधिक जरूरी है। 

क्योंकि अगर कवि अपने आसपास की घटनाओं को वैज्ञानिकता और तर्क की कसौटी पर नहीं कसता तो उसकी कविता का न तो उद्देश्य और न ही उसका फलक इतना बड़ा हो पायेगा कि वह समाज के अपने अनुभवों को सही परिप्रेक्ष्य में अभिव्यक्त कर सके।इसी तरह अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में एक बार उन्होंने लिखा था- 'एक सवाल की तरह और फिर एक विवाद की तरह, कुछ चीज़ें हमेशा संवाद में बनी रहती हैं। रचनाशीलता में मौलिकता एक तरह का मिथ है. मौलिकता एक अवस्थिति भर है जिसमें आपको एक दी हुई दुनिया का अतिक्रमण करना है। मै और मेरी रचना उतनी ही मौलिक है जितना इस संसार में मेरा अस्तित्व मौलिक है मेरी मौलिकता पूरे जड़-चेतन से सापेक्ष है निरपेक्ष नहीं. . जैसे मेरी हँसी में मेरे पिता की हँसी शामिल है।यह भूमिका काफी लंबी हो गई। कायदे से इसे अलग से होना चाहिए था। पर जनकवि के जन्मदिन पर यह छूट तो ली जा सकती है। 'साहित्य आजतक' ने इस महत्त्वपूर्ण अवसर पर उनसे बातचीत की। पर इस बातचीत से पहले हम उनकी 'यह संगीत है जो अविराम है' कविता की कुछ पंक्तियां आपको पढ़ाने का लोभ संवरण नहीं कर पाए।

अन्य खबर

चर्चित खबरें