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उजाले की चाह में अविराम बढ़ता रहा : प्रमोद दीक्षित मलय

बुंदेलखंड के बांदा जिले के एक पिछडे़ गांव ‘बल्लान’ में 1973 में जन्म हुआ और 1998 में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में सहायक अध्यापक के रूप में जुड़ना हुआ। एक शिक्षक के रूप में काम करते हुए पूरे बीस साल हो गये हैं। अपनी पढ़ाई, शिक्षक बनने की प्रक्रिया, शिक्षक रूप में अनुभव और इस दौरान मिली बाधाएं एवं चुनौतियां, समाधान के रास्ते और उपलब्धियों की ओर देखता हूं तो कुछ ऐसा चित्र उभरता है।      

पढ़ने के साथ लिखना भी प्राथमिक कक्षाओं में रहते हुए ही शुरु हो गया था। हालांकि तब यह बिल्कुल नहीं मालूम था कि पढ़ना-लिखना क्या है? लेकिन स्कूली किताबों के अलावा जो कुछ भी पढ़ पाया उसने मुझे एक बेहतर नागरिक बनने या होने में मेरी भरपूर मदद की। एक शिक्षक के रूप में अपने  स्कूल में आज जो भी नया कर पा रहा हूं उसमें बालपन से अब तक पढ़ी गई किताबों से उपजी साझी समझ का बहुत बड़ा योगदान है। पढ़ने ने मुझे शब्द-सम्पदा का धनी बनाया, लेखन में एक अपनी शैली विकसित करने में सहारा दिया और चीजों को समझने की दृष्टि भी भेंट की। मेरा भाषा और गणित का आरम्भ एक साथ हुआ बल्कि यह कहना कहीं अधिक ठीक रहेगा कि दोनों प्रत्येक व्यक्ति के शुरुआती सीखने में साथ-साथ चलते हैं। शब्द राह दिखाते हैं, अक्षर लुकाछिपी का खेल खेलते-खेलते नये शब्द रचवा लेते हैं।

आज जब पीछे मुड़कर देखता और विचार करता हूं कि पढ़ने-लिखने की शुरुआत कब, कैसे, कहां हुई तो तीन छोर नजर आते हैं। तो अभी मैं एक छोर पकड़ कर आपको ले चलता हूं अपने गांव बल्लान। बल्लान, जिला मुख्यालय बांदा से यही कोई चालीस किमी दूर पूरब की ओर बसा मिश्रित आबादी का मेरा गांव जहां मैंने अपनी आंखें खोलीं और जीवन की किताब का पहला पन्ना भी। घर के चारों ओर खेतों में भैंसलोट, परसन, तुलसी भोग, लोचई, महाचिन्नावर धान की पसरी खुशबू मन मोह लेती। पत्तियों और घास पर पड़ी ओस की बूंदें चमकतीं और 3-4 वर्ष का मैं उनके मोहपाश में बंधा गिन-गिन कर हथेली में भर लेना चाहता। पर हर बार मेरे हाथ रिक्त होते और आंखें भरी। दादी टोकतीं, ‘तुमने ज्यादा ले लिया ना, दूसरे बच्चे का हिस्सा भी। इसीलिए मोती टूट गये, समझे।’’ और फिर गिनकर चार-पांच मोती मेरी हथेली पर रख देतीं, एक के बाद एक। बहुत बाद में जान पाया कि दादी ने तो गणित का जोड़-घटाव ही नहीं पढ़ा दिया था बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का सूत्र भी अन्तर्मन में कहीं गहरे उतार दिया था कि प्रकृति से थोड़ा और अपने हिस्से का ही लो। 

दूसरा छोर, मेरी माता जी श्रीमती रामबाई, जिन्हें हम सब भाई बहन अम्मा कह के बुलाते हैं, ने दादी की सिखावन की कड़ी को आगे बढ़ाया। कहीं से मिल गई फटी ‘हिन्दी बाल पोथी’ के अक्षर और तरह-तरह के चित्रों से प्रथम परिचय अम्मा ने ही करवाया। नहला-धुला के बखरी में बैठा पोथी पकड़ा देतीं और स्वयं वहीं घर के काम करती जातीं। जांत में गेहूं पीसना हो, आंगन में सूखने के लिए धान फैलाना, कोनइता में धान दरकर बगरी बनाना या फिर ‘कांणाी’ में बगरी कूटना। महीनों मैंने केवल वर्णमाला सिखाने वाले उन अनगढ़ चित्रों को ही देखने में बिताया। अम्मा चित्रों को पहचान कर उनके नाम उच्चारण करतीं और मैं दुहराता रहता। ऐसा करते वे मुझे याद हो गये।

घर के सामने की धूल भरी धरती मेरी पाटी बनी और अम्मा ने मेरी उंगली को कलम बनाकर मुझे पहला अक्षर ‘क’ बनाना सिखाया था। जाडे के मौसम में दरवाजे के पार उगी दूब ओस से नहाई होती और मैं दूसरे बच्चों के साथ अपनी उंगली से वर्णमाला का कोई अक्षर या चित्र बना रहा होता था। तीसरा छोर मेरी औपचारिक शिक्षा के आरम्भ होने से जुड़ा है। 6 साल का होते-होते मैं गांव की पगडण्डी छोड़ अध्यापक पिता श्री बाबूलाल दीक्षित साहित्याचार्य के साथ अतर्रा कस्बे मे आ गया था। मेरी पढ़ने की औपचारिक शुरुआत यहीं से हुई। ब्रह्म विज्ञान शिशु सदन में मेरी पाटी पूजा हुई और पक्के एक में नाम लिखा गया। यहां पढ़ने एवं सीखने का विस्तृत फलक मिला। मुझे अच्छी तरह से याद है कि स्कूल में होने वाली बाल सभा में मैं गीत-कहानी सुनाया करता था। घर में कोई साहित्यिक माहौल तो नहीं था पर पिताजी ‘धर्मयुग’ और कुछ अन्य पत्रिकाएं नियमित लाया करते थे, जिसे मैं चोरी-चोरी पढ़ लिया करता था। घर में लोहे का एक पुराना बड़ा संदूक था जिसमें किताबें भरी रहा करतीं थीं। बरसात बाद पिताजी किताबों को धूप दिखाते थे। ये किताबें मुझे अपने पास बुलातीं, मेरा मन खींचतीं थीं। मैं जानने को उत्सुक था कि उनमें क्या है।

सन् 1981 की गर्मियों के अलस भरे लम्बी छुट्टी के दिन, कक्षा छह उत्तीर्ण करने के कारण कुछ विषयगत पढ़ने को था नहीं। कुछ न कुछ पढ़ने की आदत बन जाने के कारण मन में जिज्ञासा हुई कि संदूक मेे से कुछ निकाला जाये, पर पिताजी की डांट-डपट का डर। मन संदूक में रम गया था और एक दिन धीरे से एक मोटी किताब निकाल ली। संयोग से वह कथा सम्राट प्रेमचन्द्र का उपन्यास ‘गोदान’ था। तो घर के सामने लगे बरगद की छांव तले सात दोपहर में चोरी-चोरी ‘‘गोदान’’ पढ़ा। ‘गोदान’ में वर्णित तत्कालीन परिस्थितियांे ने बाल मन पर गहरा असर डाला और सामाजिक ताने-बाने को समझने की एक दृष्टि भी दी। तब अंकुरित हुए सामाजिक समरसता, समानता, सहिष्णुता, करुणा, न्याय एवं बन्धुत्वभाव आज विकसित होकर विस्तृत फलक को अपने में समेट लिए हैं। अगली पुस्तक जो हाथ लगी वह थी देवकी नन्दन खत्री का उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता’।

गोदान के यथार्थ धरातल से बिल्कुल उलट कल्पना की दुनिया की भावभूमि में बुने ‘चन्द्रकान्ता‘ ने मन को बांध लिया था। वृन्दावनलाल वर्मा की ‘मृगनयनी‘ को कैसे भूल सकता हूं, ऐतिहासिक सन्दर्भों को कल्पना के धागे में पिरोकर पाठक के चित्त को चुरा लेने की कला का दर्शन भी तभी कर लिया था। और हां, चन्द्र्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की कहानी ‘उसने कहा था‘ भी पढ़ी थी जो किसी अखबार के रविवासरीय पन्ने में छपी थी और आज भी जिसकी कटिंग मेरे पास सुरक्षित है। तमाम व्यस्तता के बावजूद मैं पढने-लिखने का मौका ढूंढ लेता हूं और किसी दिन यदि कुछ पढ़-लिख नहीं पाया तो खालीपन महसूस करता हूं। नई-नई किताबों कों पढ़ने की भूख और नया सीख पाने की ललक बहुत बढ़ गई है। इतना सब पढ़ने के बाद भी पढ़ने और लिखने से मन नहीं भरा। तो मेरी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। नियमित अखबार और पत्रिकाएं पढ़ने के कारण मेरा सामान्य ज्ञान अन्य हमउम्र बच्चों से कहीं अधिक बेहतर और समृद्ध था जिसका मुझे आगे बहुत लाभ मिला।

लेखक पर्यावरण, महिला, लोक संस्कृति, इतिहास एवं शिक्षा के मुद्दों पर दो दशक से शोध एवं काम कर रहे हैं। मोबा - 09452085234
                    

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