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सृजन करने के लिए शिक्षा के साथ दीक्षा की आवश्यकता होती है।

आध्यात्म की शक्ति ! सचमुच आध्यात्म की ताकत से जीवन सरल और सहज हो जाता है। एक ऐसी ऊर्जा, जो हमारे साथ अदृश्य रूप से परछाईं की भांति सहचरी के स्वरूप चलायमान रहती है। 

दुख दर्द के वक्त, जब हम शांति महसूस करने लगते हैं। उस वक्त महसूस होता कि एक लंबा समय ठीक अभी अभी खत्म सा महसूस हुआ। वरना सच है कि पल भर का वक्त, पहाड़ की तरह भारी महसूस होता है। जैसे कहते हैं कि जरा इंतजार का मजा लीजिए अर्थात इंतजार का वक्त बड़ा उबाऊ और रेगिस्तान में प्यासे आदमी की तरह, जल की तलाश में पल भर का समय सदियां बीतने की तरह महसूस होता है। 

लेकिन जब हमारे अंदर आध्यात्म का रेत केे एक कण की तरह का अंश व्याप्त होता है। उससे जीवन में अपरिमित शक्ति का एहसास सदृश्य सा महसूस होने लगता है। दुख दर्द से ऊपर उठने लगते हैं। यहीं से ज्ञानार्जन का क्रम स्वयमेव शुरू हो जाता है। 

इसलिये जिंदगी में धार्मिक ग्रंथ और सात्विक विचार का पान करना, भोजन में प्रोटीन लेने की तरह या इससे भी ज्यादा अच्छा होता है। शब्द को ब्रह्म कहा गया है। हमारी जिंदगी में सकारात्मक व नकारात्मक विचारों का असर सात्विक ऊर्जा व भ्रामक ऊर्जा की तरह असर होता है। जिस प्रकार आक्सीजन से जिंदगी की सांसे चलती हैं और हम ऊर्जामय रहते हैं, वैसे ही सद्विचार का जिंदगी में बड़ा असर होता है।

इसलिये हमें अपने चारो तरफ देखना चाहिए कि कहीं कुछ नकारात्मक शब्द व विचारों से अंतस में बुरी ऊर्जा का प्रवेश तो नहीं हो रहा है ? वहाँ कहीं जंग तो नहीं लगी जा रही है ? 

वैसे भी देख रहे हैं कि टेलीविजन हो या अखबार अथवा सोशल मीडिया ही, सब जगह बुरी खबरें नकारात्मक शब्दों के साथ मुख्य पृष्ठ से लेकर अंतिम पृष्ठ तक, अंदर बाहर सब जगह अपना विशेष स्थान बनाए हुए हैं और सोशल मीडिया में भी भेड चाल की प्रवृत्ति विशेष स्थान बना चुकी हैं।

मकर संक्रांति के समय पतंग उड़ाई जाती है, लेकिन यहाँ शब्दों की पतंगबाजी सभी कर रहे हैं। वह भी बिना सोचे समझे कि शब्दों का तेजधार वाला मंझा पड़ोसी मुल्क चीन के मंझे की धार से कहीं ज्यादा तेज होता है, जो पता भी नहीं चलने देता और हमें अंदर ही अंदर छीलता रहता है। 

उदाहरण सबके समझ ताजा तरीन है, सुबह सुबह पकौड़े सबको खानाा अच्छा लगता है और किसी ने पकौड़े का उदाहरण दे दिया, फिर सब अपने-अपने अनुसार पकौड़ेबाजी में तल्लीन हो गए। विचार करिए कोई कुछ स्वयं का सोचकर सृजन कर रहा है अथवा सबके सब विसर्जन ही कर रहे हैं ? 

सृजन करने के लिए शिक्षा के साथ दीक्षा की आवश्यकता होती है। आध्यात्मिक अध्ययन और मंथन की जरूरत होती है। युद्ध की बात सभी कर सकते हैं परंतु युद्ध के बीच में पहुंचकर शांति शांति की आवाज देकर शांत कराने का साहस किसी एक में ही होता है और वो एक आप भी हो सकते हैं।

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