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पत्रकार नरेन्द्र मिश्रा का जाना जनपद की पत्रकारिता पर बड़ा रिक्त स्थान

पत्रकार नरेन्द्र मिश्रा की मृत्यु की पश्चात जनपद स्तरीय पत्रकारिता के लिए सवाल और सुझाव की लंबी फेहरिस्त तैयार हो जाती है। सर्वप्रथम गौर करने योग्य है कि एक जनपद स्तरीय पत्रकार किन - किन जोखिमों के साथ पत्रकारिता करता है और अपने जीवन को दांव पर लगाए रहता है। उसकी जीवन - सुरक्षा की कहीं कोई गारंटी नहीं है। कहीं कोई असर नहीं पड़ता। चूंकि आपको कैंसर हुआ। मृत्यु की वजह कैंसर ही बना। आप एक अच्छे परिवार से थे।

मध्यवर्गीय समृद्ध परिवार से कहा जाएगा। किन्तु इतना कुछ भी नहीं था कि एक पत्रकार का परिवार इस सदमे को सह सके। आसानी से बिल्कुल नहीं सह सकता। एक बड़ी आर्थिक छति उठाना पड़ता है। संभवतः एक जनपदीय पत्रकार के लिए एवं उसके परिवार के लिए सूर्यग्रहण पड़ जाने जैसा हो जाता है। जहाँ चहुंओर अंधेरा व्याप्त हो जाता है। 

खैर वर्तमान में वह हमारे बीच नहीं रहे। लेकिन जनपदीय पत्रकारिता के लिए अपने पीछे बहुत से उसूल और जुझारूपन का आदर्श दे गए। स्वयं मैंने बचपन की उम्र से उनकी पत्रकारिता की धार देखी। युवाओं को सामाजिक काम करने के लिए प्रदान किया गया प्रोत्साहन भी देखा। वे लेखनी के साथ - साथ सामाजिक कार्यों को प्रोत्साहन प्रदान करने वाले महान व्यक्तित्व के स्वामी थे। 

बहुत कुछ अंधेरे में रह जाता है। वक्त की मांग है कि व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाश पड़ना ही चाहिए। अपने सम्पूर्ण जीवन काल में राष्ट्रीय सहारा अखबार में जिला संवाददाता की भूमिका का निर्वाह जुझारू व्यक्तित्व से किया। हर प्रकार के माफियाओं के खिलाफ लिखा। जैसे कि एक अभियान चेकडैम पर हुए भ्रष्टाचार को लेकर अनवरत लिखना , तत्पश्चात एक बड़ी कंपनी द्वारा हेराफेरी कर किसानों की जमीन औने-पौने दाम पर हड़पने की कोशिशों को बेनकाब किया और इतना जोरदार संघर्ष था कि अंततः कामयाब हुए।

किसानों की जमीन हड़पे जाने से बच सकी। एक पत्रकार ऐसे ही तमाम जनहित के कार्य कर जीवन लीला से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। फिर भी सवाल यह है कि कोई सरकार इस ओर सोच सकती है कि जनपदीय , ग्रामीण स्तरीय पत्रकार की जीवन - रक्षा एवं परिवार को सहयोग दे सके। एक ऐसी आर्थिक मदद कि ऐसी परिस्थिति पर और कैंसर जैसी बीमारी से लड़ सके , जिससे की परिवार को राहत मिल सके।

चूंकि कोई दुर्घटना हो या माफियाओं द्वारा हत्या हो तो सरकार सुविधानुसार मदद कर देती है , वह भी आवाज गूंजने पर ! वरना जनपदीय , ग्रामीण पत्रकार को किसी प्रकार की कोई जीवन - रक्षा व पारिवारिक सहायता आदि की कोई गुंजाइश व नीति नजर नहीं आती। यदि सरकार और संविधान अभिव्यक्ति की आजादी की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं , तो इस स्वतंत्रता की मौलिकता हेतु केन्द्र एवं राज्य सरकार चिंतन करना चाहिए।

कम से कम पत्रकार हित में कोई बीमा योजना लागू कर दें। कुछ तो ऐसा करें जो पत्रकार के लिए हो। उसको मेडिकल आदि की सुविधा मिल सके और कैंसर जैसी बीमारी से लड़ने की व्यवस्था हो। हालांकि यह जनता का मुद्दा है और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का इलाज मुफ्त में सरकार द्वारा हो तो जनहित का कदम होगा। जबकि दिल की बीमारी भी इसी श्रेणी मे आती है। कैंसर और दिल की बीमारी का इलाज प्रत्येक जनपद स्तर पर बामुश्किल ही हो पाता है। अतः महसूस होता है कि सरकार को जनहित एवं पत्रकार व पत्रकारिता के हित में अतिशीघ्र कुछ करना चाहिए। जिससे जनता की आवाज बनने एवं सरकार से संवाद स्थापित करने - करवाने का उत्साह सभी में बना रहे।  

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