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पूर्व जन्म होता  है , एक बच्ची पर परीक्षण से हुआ सिद्ध। 

एक ऐसी कम उम्र की बच्ची। जो जन्म के कुछ एक - दो वर्ष पश्चात बोलने - सुनने और महसूस करने की क्षमता के समय गाने - बाजे की आवाज सुन रोने लगती थी। विचलित हो जाती थी। खुशी की धुन सुन सामान्य व्यक्ति कभी भी रोता नहीं। यहाँ तक की शव यात्रा में बजने वाले बैंड की आवाज सुनकर भी आमतौर पर कोई रोने नहीं लगता।

जब तक की शव यात्रा का मृत व्यक्ति एकदम करीबी ना हो। ऐसा क्या था ? , कि वह बच्ची महज चार - पांच वर्ष की उम्र में शहनाई की धुन सुनकर रोने लगे ? रोना - धोना जानकर उस बच्ची से सवाल किया गया कि शादी में चलना है , नहीं व घबरा गई। परिजनों द्वारा उसकी शादी की चर्चा की जाने लगी।

स्वयं मैंने भी उससे कहा कि तुम्हारी शादी कर देंगे। लेकिन यह क्या हुआ ? विवाह किए जाने का नाम सुनते ही वह खूब विचलित होती और रोने लगती। विवाह के प्रश्न का जवाब भी अजीबो-गरीब मिलता। स्वयं कहने लगती कि मुझे नदी में फेंक दिया था। कभी कहती कि आग लगा दी थी। साथ ही सास शब्द सुनते ही कहती कि उसे तो मार डालूंगी।

वह ऐसे ही कुछ ना कुछ कहती , जिससे यह समझ में आने लगा कि उसमें पूर्व जन्म की कुछ स्मृतियां अब भी ताजा हैं। यही वजह थी कि शादी शब्द सुनकर ही हतप्रभ करने वाला व्यवहार करती और शादी करने से साफ जोरदार इंकार करती , जैसा इंकार कोई आम स्त्री - पुरूष परिजनों के दबाव में शादी को लेकर नहीं कर पाते और स्वयं की पसंद व प्यार से शादी करने से वंचित रह जाते हैं।

 अब वही लड़की लगभग 9 वर्ष की हो चुकी है। शादी की चर्चा करो तो तैयार रहती है। वो कहती है कि हाँ कर दो शादी। उसे ससुराल और शादी की सब समझ है। सिर्फ इतना ही नहीं अनेक शादियों में खुशी खुशी सम्मिलित भी रही। इस एक बेटी की वजह से पूर्व जन्म को लेकर मेरी धारणा को मजबूती मिली। इस धारणा को भी बल मिला कि अपने जीवन में हम जिनके भी करीब रहते हैं और एक रिश्ता बनता है , आवश्यक है कि उनसे हमारा पूर्व जन्म का कोई रिश्ता रहा हो। 

कोई हमारे साथ धोखा करके चला जाता है। एक ही परिवार में सुख - शांति नहीं होती। पति - पत्नी होकर भी आत्मीय सुख नहीं महसूस होता। कुछ ना कुछ खटकता रहता है , वह प्रेम अहसास नहीं होता जो एक रिश्ते में आवश्यक है। पिता - पुत्र की आपस में पटती नहीं। एक पुत्र को पिता से अनजाना भय महसूस होता है। परिवार के अंदर ही कुछ ऐसी घटना घट जाती है , जिसको लेकर सोच नहीं सकते तो यही वो प्रारब्ध है कि रिश्तों के रूप में भी हमारे किसी जन्म के दुश्मन हो सकते हैं।

जिसका हमें तनिक भी आभास नहीं रहता। सभी का पूर्व जन्म होता है और पूर्व जन्म है तो सोलमेट भी होता है। यह पाश्चात्य सभ्यता एवं भारतीय आध्यात्मिक साहित्य से भी प्रमाणित है। समाज भ्रमित हो सकता है , भटक सकता है और व्यक्ति कुंठित हो सकता है। किन्तु पूर्व जन्म , पुनर्जन्म और सोलमेट को लेकर कोई संशय नहीं है। बल्कि यह पढ़कर व वास्तविक परीक्षण से थोड़ा बहुत स्वयं मैने जाना है। एक कम उम्र की बच्ची पर परीक्षण इत्तेफाक से कर सका और कुछ हद तक समझ विकसित हो सकी। 

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