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आधुनिकता की चकाचौंध ने गरीब कुम्हार का रोजगार छीना

जिससे दो वक्त की रोटी खाने-कमाने को वह पलायन करने को मजबूर हैं। लेकिन स्वाभिमानी कुम्हार समाज के बुजुर्ग अभी भी अपने पुश्तैनी कारोबार को अंजाम देकर रुखी-सूखी किसी तरह खा रहे हैं। दीपावली का पर्व उनके लिए एक सुनहरा अवसर बनकर आता है। जिससे दो-चार माह का खर्च आसानी से चल जाता है।

नगर के हटवारा मोहल्ला में कुम्हार समाज निवास करता है। पूर्व में मिट्टी के सामानों की मांग अधिक हुआ करती थी जिससे कुम्हार समाज का भरण-पोषण आसानी से हो जाता था लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध ने अब मिट्टी का क्रेज पूरी तरह खत्म कर दिया है। मिट्टी के घड़ों की जगह मनुष्य फ्रिज, मिट्टी के बर्तनों की जगह स्टील के वर्तन आदि का इस्तेमाल करने लगा है।

जिससे कुम्हार समाज का रोजगार पूरी तरह विलुप्त होता जा रहा है। परिवार के भर-पोषण के लिए अधिकतर कुम्हार समाज के लोग महानगरों को पलायन कर चुके हैं। जहां वह मेहनत-मजदूरी कर दो वक्त की रोटी जुटा रहे हैं। बुजुर्ग कुम्हार दंपति गनेश प्रजापति व गुलाबरानी बताते हैं कि दीपावली पर्व पर दीपक की बिक्री हो जाने से किसी तरह दो-चार माह उनका खर्च आसानी से चल जाता है।

इसके बाद उन्हें मेहनत-मजदूरी करनी पड़ती है। बताया कि बड़ा दीपक एक रुपए की दर से व छोटा दीपक 50 पैसे की दर से बिकता है। कहा कि दीपक बनाने में लागत अधिक बढ़ गई है जिससे यह व्यापार पूरी तरह विलुप्त होने की कगार पर है।

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