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स्वामी विवेकानंद को शिकागो सम्मेलन में करना पड़ा था कठिनाई का सामना.

कोई भी महान कार्य होता है , उसकी सुगंध हमे दूर तक आकर्षित करती है। महान कार्य करने वाला व्यक्ति महा - व्यक्तित्व बन जाता है। स्वामी विवेकानंद और सर्व धर्म सम्मेलन का वह भाषण हमेशा चर्चा का विषय रहता है। बहुत से लोग उनकी महानता का वर्णन करते हैं। हाल ही में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी धर्म सम्मेलन पर हिन्दुत्व की अवधारणा पर प्रकाश डाल चुके हैं।

किन्तु स्वामी विवेकानंद ने सनातन धर्म पर प्रकाश डाला था। इसलिये स्वामी जी की महानता अद्वितीय बनी रहेगी। किन्तु किसी भी महान कार्य के पीछे महा - संघर्ष की गाथा होती है। स्वामी विवेकानंद के संघर्ष का वर्णन कोई नहीं करता , यह नहीं बताते कि शिकागो पहुंचने के लिए उनके पास पर्याप्त धन नहीं था ! भारत से शिकागो तक की यात्रा में कितनी कठिनाई छिपी है और स्वामी जी का उदासीन हो जाना।

उनके अंदर इस भाव का जन्म होना कि भारत लौट चलने मे ही भलाई है। इससे अनुभूति होती है कि असाधारण व्यक्तित्व के अंदर एक साधारण इंसान हमेशा छिपा रहता है। भारत की दयनीय हालत अगर थी , है और रहेगी तो स्वयं भारत के लोग जिम्मेदार हैं। जिन्होंने वक्त पर सहर्ष स्वामी विवेकानंद की भी मदद करने से इंकार कर दिया था।

भारत की एक धार्मिक संस्था ने अपना प्रतिनिधि घोषित करने का प्रमाण पत्र देने तक से इंकार कर दिया था। इससे पूर्व शिकागो की यात्रा से पहले स्वामी विवेकानंद ने भारत में धर्म यात्रा शुरू की थी। इस हेतु भी उनके सामने आर्थिक समस्या थी। किन्तु तत्कालीन महराज चमराजेन्द्र से उनकी मुलाकात हुई थी। उन्होंने धर्मयात्रा में आ रही आर्थिक समस्या से अवगत कराया।

महराज उनकी आर्थिक मदद करने को तैयार हो गए। कन्याकुमारी पहुंचने के बाद उन्हें शिकागो में होने वाले वैश्विक धर्म सम्मेलन का पता चला था। इस बीच खेतडी के नरेश महराज अजीत सिंह का बुलावा आया और स्वामी जी ना चाहते हुए भी एक उम्मीद के साथ महल पहुंच गए। चूंकि स्वामी जी के आशीर्वाद से खेतडी नरेश को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी।

यह भी एक कारण था कि खेतडी नरेश शिकागो की यात्रा का समस्त व्यय हेतु तैयार हो गए व विदेश गमन की व्यवस्था की। इसके बावजूद स्वामी विवेकानंद को विदेशी धरती पर ठगी का शिकार होना पड़ा। भारतीयों से अधिक धन वसूलते थे , अमेरिका के व्यापारी। उस वक्त अमेरिका आर्थिक मंदी में भी था पर पाश्चात्य संस्कृति की चमक - धमक दमक रही थी। 

एक सभ्य और अमीर संस्कृति में स्वामी विवेकानंद की मदद करने वाला कोई सहज भाव से दिख नहीं रहा था। उनके मन में भारत लौट चलने के विचार उत्पन्न हो रहे थे। किन्तु एक अमेरिकी महिला और पुरूष की मदद से स्वामी जी शिकागो धर्म सम्मेलन के कार्यालय तक पहुंच चुके थे।

मिस्टर जे.एच. राइट की मदद से भारत का यह विद्वान सपूत अपने राष्ट्र और धर्म का पक्ष रखने के लिए सम्मिलित हो सका था। सत्य है कि महान से महान कार्य प्रतिकूल परिस्थिति पर ही घटित हुए हैं। जिन्होंने विपरीत परिस्थिति मे कार्य करना जारी रखा , वही सफल हुए हैं। किन्तु बहुत से लोग हर वक्त बहाना करते कि कुछ समय बाद आराम मिलेगा और हम समाज के लिए करेंगे , जबकि ऐसा वक्त कभी आता नहीं।

सामूहिक रूप से राष्ट्रीय भावना से समाज के लिए कुछ किया जा सकता है। अन्यथा कोई स्वामी विवेकानंद अपना रास्ता और यात्रा तय कर लेते हैं। बहुत ना सही कुछ तो हैं मददगार , उनकी ही मदद की उंगली से संसार गोवर्धन पर्वत के नीचे सुरक्षित है।

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