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सर्वव्यापक और न्यायकारी ईश्वर

ईश्वर का दंड एवं उपहार दोनों असाधारण हैं। इसलिए आस्तिक को सदा ध्यान रहेगा कि दंड से बचा जाए और उपहार प्राप्त किया जाए। यह प्रयोजन छुटपुट पूजा-अर्चना, जप-ध्यान से पूरा नहीं हो सकता। यह भावनाओं और क्रियाओं को उत्कृष्टता के सांचे में ढालने से ही पूरा होता है। न्यायनिष्ठ जज की तरह ईश्वर किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। अपना गुणगान करने वाले के साथ यदि वह पक्षपात करने लगे, तब उसकी न्याय व्यवस्था का कोई मूल्य न रहेगा, सृष्टि की सारी व्यवस्था ही गड़बड़ा जाएगी। सबको अनुशासन में रखने वाला परमेर स्वयं नियम व्यवस्था में बंधा है। यदि वह उच्छृंखलता व अव्यवस्था बरतेगा तो फिर उसकी सृष्टि में पूरी तरह अंधेरा फैल जाएगा। फिर कोई उसे न तो न्यायकारी कहेगा और न समदर्शी। भगवान को हम सर्वव्यापक व न्यायकारी समझकर ईश्वर के दंड से डरें। उसका भक्त वत्सल ही नहीं, रौद्र रूप भी है, जो रुग्ण, मूक, बधिर, अंध, अपंगों की दशा देखकर सहज समझा जा सकता है। केवल बंशी बजाने वाले और रास रचाने वाले ईश्वर का ही ध्यान न रखें। उसका एक त्रिशूलधारी रूप भी है, जो दुरात्माओं का दमन व मर्दन करता है। न्यायनिष्ठ जज की तरह ईश्वर को भी भक्त-अभक्त, प्रशंसक-निंदक का भेद किए बिना व्यक्ति के शुभ-अशुभ कर्मो का दंड या पुरस्कार देना होता है।

उपासना का उद्देश्य ईश्वर से अनुचित पक्षपात करना नहीं होना चाहिए। वह हमें सत्प्रवृत्तियों में संलग रहने और सत्पथ से विचलित न होने की दृढ़ता प्रदान करे। यही ईश्वर की कृपा का सर्वश्रेष्ठ चिह्न है। आस्तिक या नास्तिक की पहचान तिलक, जनेऊ, कंठी, माला  आदि के आधार पर नहीं, वरन भावनात्मक व क्रियात्मक गतिविधियों को देखकर ही होती है। आस्तिक की मान्यता प्राणिमात्र में ईश्वर की उपस्थिति देखती है। इसलिए उसे हर प्राणी के साथ उदारता, आत्मीयता व सेवा सहायता भरा व्यवहार करना पड़ता है। भक्ति का अर्थ है- प्रेम। जो प्रेमी है, वह अपने प्रियतम को सर्वव्यापक देखेगा और सभी से सौम्यतापूर्ण व्यवहार कर भक्ति भावना का परिचय देगा। ईश्वर दर्शन का यही रूप है। हर चर-अचर में छिपे परमात्मा को जो अपनी ज्ञान दृष्टि से देख सका और तदनुरूप कर्त्तव्य निर्धारण कर सका, मानना चाहिए, उसे ईश्वर दर्शन का लाभ मिल गया। अपने में परमेर और परमेर में अपने को देखने की दिव्य दृष्टि जिसे मिल गई, समझो उसने पूर्णता का जीवन लक्ष्य प्राप्त कर लिया है।

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