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प्रेम की निश्छल जलधारा है सियांग के उस पार-शुभम

देश के पूर्वोत्तर का आईना है"सियांग के उस पार"-शरद सिंह

नैसर्गिक, सहज प्रेम की अभिव्यक्ति है "सियांग के उस पार" -मुन्ना शुक्ला

वायुसेना में 10 वर्ष कार्य करने के बाद अपने जीवन के अनुभवों और  संस्मरणों को डायरी पर अंकित करने की आदत मुझसे उपन्यास लिखवा लेगी,यह नहीं जानता था। मैं कोई लेखक नहीं। 30वर्षीय पुरानी डायरी के पीले पड़ते पन्नों में जो अनुभव और स्मृतियां सुरक्षित थीं उन्हें कुछ वास्तविक, कुछ काल्पनिक कथाओं के द्वारा अरुणांचल प्रदेश का प्राकृतिक सौंदर्य,नैसर्गिक प्रेम और नार्थ ईस्ट का सौंदर्य एक सैनिक की कठिन जीवन शैली में बन पड़ा।सागर के प्रबुद्ध श्रोताओं के बीच इतने उत्कृष्ट माहौल में मेरी पुस्तक पर चर्चा होने मेरा सौभाग्य है।यह बात आदर्श संगीत महाविद्यालय सागर में गत दिवस उपन्यास " सियांग के उस पार " की समीक्षा पर आयोजित हुई सहित्य अकादमी, म.प्र.संस्कृति परिषद भोपाल की स्थानीय इकाई सागर पाठक मंच की 58 वी गोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए पुस्तक के लेखक दयाराम वर्मा ने कही। अध्यक्षीय उद्बोधन में सुप्रसिद्ध लेखिका डॉ. सुश्री शरद सिंह ने कहा कि दयाराम वर्मा का यह उपन्यास एक महत्वपूर्ण  कृति है।

यह मानवीय संबंधों के समानांतर पूर्वोत्तर के जीवन, प्रकृति और संस्कृति से भी परिचित कराता है और उस भू-भाग में विचरण कराता है जिसे हिन्दी साहित्य में अपेक्षाकृत कम स्थान मिला है। यदि एक वाक्य में कहा जाए तो 'सियांग के उस पार' उपन्यास देश के पूर्वोत्तर का आईना है। समीक्षा आलेख वाचन करते हुए युवा रंगकर्मी शुभम उपाध्याय ने कहा कि श्री दयाराम वर्मा जी द्वारा लिखित उपन्यास सियांग के उस पार के माध्यम से लेखक का अवचेतन, तर्क रूपी मस्तिष्क और भावरूपी हृदय के बीच सन्तुलन बनाता हुआ एक ऐसी अप्रतिम प्रेम कथा को हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है जो संवेदनशील मानवी के हृदय स्पन्दनों को आंदोलित कर दे..जो प्रकृति और मनुष्य के बीच तल्ख होते रिश्तों पर मलहम लगाकर इस पावन संबंध में प्राण भर दे..तो जो त्याग समर्पण और प्रेम की अनंत निश्छल जल धाराओं में अपने हिस्से का पानी भर दे..कुछ ऐसा स्वरूप है उपन्यास का।

समालोचक मुन्ना शुक्ला ने अपने समीक्षात्मक वक्तव्य में यह स्थापना की कि इस सुंदर उपन्यास में स्त्री-पुरुष के प्रेम,सामान्य मानवीय प्रेम के अलावा मेम्बा जनजाति की निसमी नामक लडक़ी का अपनी बड़ी बहन निमी के प्रति नैसर्गिक, सहज और निस्वार्थ प्रेम अभिव्यक्त होता है। इस तरह के कथा तत्व हिंदी उपन्यास में विरल हैं। डॉ. महेश तिवारी ने लेखक की उपस्थिति में उसकी कृति पर चर्चा करने के पाठक मंच के प्रयासों को सराहा। चर्चा में डॉ. गजाधर सागर, डॉ. चंचला दवे,डॉ. वर्षा सिंह, डॉ. मनोज श्रीवास्तव और सुभाष कंडया ने भी भागीदारी की। इस अवसर पर पुस्तक के लेखक दयाराम वर्मा का शाल,श्रीफल व पुष्पहार से अभिनंदन भी किया गया।

प्रारम्भ में पाठक मंच सागर के सह केंद्र संयोजक कपिल बैसाखिया ने गोष्ठी परिचय दिया तथा अतिथियों का श्रीफल भेंट कर स्वागत किया। डॉ. नलिन जैन ने लेखक का जीवन परिचय दिया। संचालन प्राध्यापक डॉ.नौनिहाल गौतम ने किया और आभार श्रुतिमुद्रा संस्था की सचिव डॉ.कविता शुक्ला ने माना। गोष्ठी के अंत में पाठक मंच के केंद्र संयोजक उमा कांत मिश्र व श्यामलम संस्था के प्रणेता स्व.श्यामाकांत मिश्र के बहनोई दिनेन्द्र शंकर मिश्र के निधन पर मौन श्रद्धाजंलि अर्पित की गई।

गोष्ठी में निर्मलचंद निर्मल, श्रीमती निर्मला वर्मा, डॉ.कुसुम सुरभि, डॉ.मनीष झा, शाम्भवी शुक्ल मिश्र, डॉ. छबिल मेहर, डॉ. राजेश दुबे. प्रो.अमर जैन, कुंदन पाराशर, जल.राठौर प्रभाकर, सिद्धार्थ शुक्ल, अल्का शुक्ल, टी.आर.त्रिपाठी, हरि सिंह ठाकुर, राजेन्द्र दुबे कलाकार, पुष्पदंत हितकर, डॉ.नवनीत धगट, डॉ. सतीश पांडेय, आर.के.तिवारी, रमेश दुबे,के. एल. तिवारी अलबेला, मुकेश निराला, वृन्दावनराय सरल, पी.आर.मलैया, डॉ.अरविंद गोस्वामी, मुकेश तिवारी, नवल स्वर्णकार, डॉ.राम रतन पाण्डेय, डॉ.ऋषभ भारद्वाज, वीरेंद्र प्रधान, डॉ. जी.आर.साक्षी, संतोष दांगी सरस, अपूर्व मिश्र, दामोदर चक्रवर्ती आदि उपस्थित रहे।

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