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भय्यू जी की आत्महत्या से उपजा सवाल जिंदगी जीते कितने लोग हैं ?

ख्वाहिशें हमारी यही होती हैं , रहने के लिए अच्छा घर हो और पहनने के लिए अच्छे कपड़े हों। अच्छी नौकरी , अच्छा व्यापार हो। जीवन के जिस क्षेत्र में हों सर्वोत्तम स्थान पर हों। राजनीति का क्षेत्र हो , समाजसेवा का क्षेत्र हो अथवा क्षेत्र पत्रकारिता का हो सब एक-दूसरे के पूरक हैं और अब तो संत की संतई भी राजनीति का पूरक हो चली है। धर्म कोई भी हो , उसके धर्म गुरु राजनीति पर हस्तक्षेप करने लगे हैं। आध्यात्मिक संत होकर राजनीतिक हस्तक्षेप प्रभावशाली हो जाता है। ऐसे ही भय्यू जी महाराज का रहन-सहन व चाल - ढाल सबकुछ आकर्षण का कारण है। सिर्फ इतना ही नहीं उनका चेहरा - मोहरा भी जानदार दिख रहा था। एक खूबसूरत सा नौजवान , जो आध्यात्मिक संत के नाम से पुकारा जा रहा है और उस पर मध्यप्रदेश के मामा मुख्यमंत्री भी फिदा रहे।

आखिर किस व्यक्ति की ख्वाहिश नहीं होगी कि उसे राज्य मंत्री बना दिया जाए और भय्यू जी महाराज को यह दर्जा बतौर उपहार मिला। अगर एक आम आदमी की दृष्टि से देखें तो बतौर समाजसेवी एवं आध्यात्मिक संत के आधार पर जिंदगी का सफलतम पल कहा जाएगा। जिंदगी की आंतरिक उथल-पुथल से इतर हर बाहर वाला व्यक्ति यही सोचेगा , अरे कितनी आलीशान जिंदगी है। अब सोचना और पूंछना क्या ? अपार धन - संपदा और राज्य से लेकर केन्द्र सरकार तक पहुंच तो अधिकारी व कर्मचारी की क्या बिसात ? वह तो सतरंज की ऐसी मोहरे होगीं कि जब मन चला , जिधर चलाना हो एक सैनिक की तरह चाल चल दी , वह भले मर जाए।

वाह्य (बाहरी) जिंदगी कितनी आकर्षण से भरी हो आवश्यक नहीं कि वह व्यक्ति आंतरिक रूप (अंदर से ) से उतना ही सुख में जी रहा हो। यह भी आवश्यक नहीं आंतरिक रूप से बलिष्ठ हो ! ऐसे ही सोशल मीडिया पर बहुत से लोग विचार साझा करते हैं और तस्वीरें साझा करते हैं , शादी से लेकर सालगिरह तक की खूबसूरत तस्वीरें खूबसूरत शब्दों से साझा की जाती हैं और बहुतायत देखने सुनने पढ़ने को मिलता कि अरे पता ही नहीं चला कब दशकों बीत गए ? सोशल मीडिया पर अपवाद स्वरूप रोने की तस्वीर किसी ने साझा की हो तो की हो अन्यथा यहाँ हंसने - खुश रहने की तस्वीर ही शेयर की जाती है।बाहर की दुनिया बड़ी आकर्षण युक्त दिखती है , तो आवश्यक नहीं कि अंदर की दुनिया उतनी ही सुखमय और शांत - सहज हो। दिखावे की दुनिया में हम भय्यू जी को भी देख रहे थे। अब गुजर जाने के बाद कुछ रहस्य दुनिया के सामने आ रहे हैं।

हालात कैसे भी रहे हों लेकिन उनका इस तरह से आत्महत्या करना संत समाज पर सवाल खड़ा कर गया ? आध्यात्मिक संत समाधि लेता है और देह त्याग दे तो वह संत होता है नाकि आत्महत्या करता है। हाँ एक प्रभावशाली शख्सियत रहे कि उनके द्वारा किसान और जरूरतमंद के लिए काम किए गए। यही उनकी ताकत थी। भय्यू जी महाराज का जीवन और उनके जीवन का अंत समाज के लिए एक सीख है। युवाओं के लिए सीख है। उनके लिए जानने योग्य है , जो चमक - दमक की दुनिया जीने के लिए बेताब रहते हैं और जीवन भर ऐसे सुख पाने के लिए आंतरिक रूप से बेचैन रहते हैं। साथ ही उनके लिए सीख है , जो चमक - दमक वालों का ही सम्मान करते हैं। उनके विचारों को ही महत्व देते हैं , बल्कि जन्म और मृत्यु ऐसे ही निर्धारित है।

इसलिये दिन में एक बार मृत्यु को महसूस करिए , तो जीवन का रहस्य महसूस होगा। आंतरिक सुख और समृद्धि से अंत समय तक जीवन का सुख है नाकि भय्यू जी महाराज जैसे आकर्षण पूर्ण जीवन भर जीते हुए दिखने में सुख है परंतु तमाम सामाजिक मर्यादा एवं आकर्षण से इतर जब हर हाल में प्रेम को जी सकें और महसूस कर सकने के साथ अपना सकें। जिंदगी का सच भय्यू जी जैसा ही है , मृत्यु तय है परंतु जीवन ही जी लें यही बहुत है। जिंदगी जीते कितने लोग हैं ?

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