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गिलास जैसे रूपक से मन को महसूस करें युवा

मन कहता है कि आज ना लिखो , कुछ खाली - खाली सा लगता है और गिलास खाली होगा तो छलकेगा क्या ? पिएंगे क्या ? गिलास में पानी हो अथवा मादक पदार्थ ! जो भरा होगा वही छलकेगा , वही पिया जाएगा। मन ऐसे ही गिलास की तरह है या कोई भी बर्तन को रूपक मान सकते हैं। अगर मादक पदार्थ होगा तो जमीन पर गिरेगा और गंदगी फैलेगी , अगर मादक पदार्थ पिया जाएगा तो यकीनन कुछ ना कुछ गडबड होना ही है।

मन में हिंसा के भाव तरल स्वरूप में भरे होगें तो शब्द भी हिंसक रूप में बाहर आएंगे और भीड़ अक्सर हताशा व हिंसा रूप में ही दिखा करती है , जो अतिशीघ्र ही उन्माद से भी अपना हित चाहती है। इसलिए अगर उन्माद फैलाना हो , उन्मादी शब्द लिखे जाएं तो लोग चटखारे भी स्वादिष्ट चाट खाने की तरह लेते हैं। मुह में पानी आ जाए। एक बार उन्माद बाहर निकल गया फिर खाली हो जाओगे ? जरा ठहरो और सोचो कि इससे पहले पुनः उन्माद भर जाए। पुनः वही उबाऊ प्रक्रिया होगी। इसलिए पढ़ते लिखते हुए सोचना चाहिए कि जो पढ़ रहे हैं , उससे स्व मन से लेकर दूसरों के मन तक क्या असर पड़ेगा ? लोग आपकी तासीर की कैसी तस्वीर महसूस करेंगे ? आप कितना सहज विश्वास करेंगे ?

मेरा खाली गिलास सा मन ऐसा ही कुछ सोचता है , जब तक कि मैं अतिशीघ्र पहले का लिखा हुआ संग्रहीत ना कर लूं। मन की पुकार है कि एक बार फिर पीछे मुड़ जो कुछ भी छूट गया है , उसे संग्रह कर लो और फिर अच्छा पढ़ो , अच्छा लिखो। सात्विक शब्दों से सात्विक लिखो और वैचारिक असहमति का जवाब भी मुहब्बत वाले शब्दों से दो , भले संख्या कम हो पर जो सफर बुराई ने तय किया है , उससे दस गुना ज्यादा सफर अच्छाई को तय करना होगा।

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