< मजबूत गठबंधन के साथ जीत के लिए बलिदान की आवश्यकता  Hindi News - Breaking News, Latest News in Hindi, हिंदी में समाचार, Samachar - Bundelkhand News भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी "/>

मजबूत गठबंधन के साथ जीत के लिए बलिदान की आवश्यकता 

भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बहुत पहले ही बदलाव के दौर से गुजरती भारतीय राजनीति की दिशा को पहचान लिया था। यही वजह थी कि उन्होंने विभिन्न दलों के गठबंधन को स्वीकारते हुए अपने विचारों को इबारत में ढाल दिया था। दरअसल अटल जी के नाम से पूर्व में 'गठबंधन की राजनीति' नाम से प्रकाशित पुस्तक में कहा गया था कि 'भारतीय राजनीति गठबंधन के दौर में न केवल प्रवेश कर चुकी है, बल्कि गठबंधन की सरकारों का गठन अब भारतीय लोकतंत्र का वर्तमान और आगामी अतीत नजर आ रहा है। राष्ट्रीय दलों ही नहीं, क्षेत्रीय दलों की पैठ मतदाताओं में जितनी गहरी होती जाएगी, यह चलन बढ़ेगा।' इसे दूसरे विचारकों ने लोकतंत्र का संक्रमण काल भी कहा था, लेकिन हमने देखा है कि किस तरह से प्रमुख राष्ट्रीय दलों को क्षेत्रीय दलों की बैसाखी की आवश्यकता आन पड़ी, क्योंकि संसद या विधानसभाओं में सरकार बनाने जादुई आंकड़े को पार करने के लिए गठबंधन आवश्यक हो गया था।

ऐसे में कांग्रेस का यूपीए और भाजपा का एनडीए गठबंधन छोटे और क्षेत्रिय दलों के बल पर ही सत्ता हासिल करने में कामयाब होता रहा है। यह क्या कम बात रही कि पिछले लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत के बावजूद भाजपा ने गठबंधन को महत्व दिया और कहा कि वो गठबंधन में रहते हुए ही सरकार को आगे भी चलाती रहेगी। बहरहाल यहां यह बात इसलिए कही जा रही है क्यों कि केंद्र में सरकार बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश से खबर आ रही है कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गठबंधन को लेकर बड़ा बयान दे दिया है। चूंकि बुआ और भतीजे की जोड़ी ने उत्तर प्रदेश के उप चुनाव में बेहतर रिजल्ट लाए हैं अत: इससे वशिभूत हो अखिलेश कुर्बानी की बात भी करते देखे जा रहे हैं। दरअसल अखिलेश का कहना है कि भाजपा को सत्ता से बाहर करना उनका प्रमुख लक्ष्य है और इसके लिए वो 2019 में बसपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे।

वैसे गठबंधन में रहने की घोषणा तो वो पहले ही कर चुके हैं, लेकिन मुख्य बात जो कि अखिलेश कहते हैं कि 'हमारा बसपा के साथ गठबंधन है और यह जारी रहेगा। भाजपा को हराने के लिए यदि दो-चार सीटों का बलिदान भी देना पड़ा तो हम पीछे नहीं हटेंगे।' इस प्रकार गठबंधन के लिए कुर्बानियां देने को भी अब राजनीतिक दलों के प्रमुख तैयार होते दिख रहे हैं। इस कदम में पार्टी कार्यकर्ताओं और क्षेत्रीय नेताओं की कितनी सहमती और भागेदारी होगी यह देखने वाली बात है। फिर भी कहना तो यही पड़ेगा कि  गठबंधन की मजबूती के लिए यह एक अच्छा संकेत है। इसी प्रकार यूपीए घटक के अन्य दलों को भी आगे आते हुए गठबंधन के महत्व को प्रतिपादित करना होगा, तभी एकजुटता के साथ राजनीतिक मजबूती जीत के रास्ते तय कर सकेगी। यह इसलिए भी जरुरी हो गया है क्योंकि क्षेत्रीय मुद्दों पर ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय मुद्दों पर भी मतदाताओं को अब अपने क्षेत्रीय दलों पर राष्ट्रीय दलों की अपेक्षा ज्यादा भरोसा रहने लगा है।

इस कारण मतदाता चाहता है कि उनके क्षेत्रीय दलों के नेता भी राष्ट्रीय स्तर पर उनका प्रतिनिधित्व करें। इसी के साथ पिछले करीब दो दशक में राजनीतिक पटल पर गठबंधन के महत्व की तस्वीर भी साफ हो चली है, इसलिए प्रमुख राजनीतिक दल इससे हटकर चुनाव लड़ने की सोच भी नहीं रहे हैं। यह अलग बात है कि इस मजबूरी को जानते हुए ही कुछ क्षेत्रीय दल बेजा लाभ लेने के लिए अनावश्यक दबाव भी बनाते दिख रहे हैं। इससे परे अखिलेश ने कहा है कि वह भाजपा के हर प्रत्याशी की हार देखना चाहते हैं और इसके लिए किसी के साथ भी गठबंधन को तैयार हैं। इस प्रकार अखिलेश की तरफ से गठबंधन में शामिल होने और लाभ प्राप्त करने मानों राजनीतिक दलों को खुला आमंत्रण है। यहां समझने वाली बात यह है कि मात्र सपा के यह कह देने से बात नहीं बनने वाली कि वो कुर्बानी देने को तैयार हैं, बल्कि यही धारणा और विश्वास अन्य दलों में भी होनी चाहिए, फिर चाहे वह खुद कांग्रेस ही क्यों न हो। यहां एक ही फार्मूला चलना चाहिए और वह यह कि जो उम्मीवार चुनाव जीतने की स्थिति में होगा उसे गठबंधन की ओर से आगे किया जाए।

भाई-भतीजाबाद और दलगत राजनीति से परे हटकर एक बार फिर मजबूत गठबंधन की राजनीति करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इसमें जिन दलों का समूह एकजुटता दिखाने में सफल होगा वही सत्ता सुख प्राप्त करने में कामयाब होगा। इस बयान से पहले कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद जो नाटकीय घटनाक्रम सामने आया उसे भी देख कर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए छोटे और बड़े का दंभ पालने से बेहतर होगा कि जीतने के लिए बाजी खेली जाए। इसके लिए समय आ गया है कि जमीनी कार्य किए जाएं और मतदाताओं के मन को टटोला जाए कि आखिर वह किस तरह का जनप्रतिनिधि चाहते हैं।

ससे हटकर जिस तरह से शिवसेना ने केंद्र और राज्य सरकार की नींद हराम कर रखी है, उससे भी एनडीए गठबंधन पर संकट के बादल छाते नजर आ रहे हैं। चूंकि केंद्र समेत अनेक राज्यों में भाजपानीत सरकार है अत: सहयोगी दलों व संगठनों को पिछले चार साल से इन सरकारों से ज्यादा उम्मीदें रही हैं, लेकिन इनका उम्मीद पर खरा नहीं उतरना भाजपा के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बनता जा रहा है। यही वजह है कि अब अपने ही विरोध में खड़े होते दिख रहे हैं। जबकि यूपीए गठबंधन तमाम मतभेदों के बावजूद एकजुटता की ओर यदि अग्रसर होता है तो उसके लिए विजयश्री का वरण कोई बड़ी बात नहीं होगी।

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