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खराब होती ईवीएम से लोकतंत्र को कैसा खतरा

उत्तर प्रदेश के कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा सीटों पर हुए मतदान के दौरान बड़े पैमाने पर ईवीएम मशीनों के ख़राब होने की शिकायतें मिली हैं, जिसे लेकर समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल ने तो बकायदा चुनाव आयोग में लिखित शिकायतें की हैं। ईवीएम गड़बड़ी की शिकायतों के साथ ही बताया गया है कि अनेक स्थानों में काफी देर तक मतदान बाधित रहा और मतदान नहीं कर पाने के कारण कई लोग वापस घरों को लौट गए। इस प्रकार एक तरफ देश में सभी के लिए मतदान अनिवार्य करने की बात चल रही है तो दूसरी तरफ जो लोग लाइन में लगकर मतदान करने को तैयार दिखे उन्हें मशीनों की खराबी के चलते मताधिकार से वंचित भी रहना पड़ा है।

विपक्ष का आरोप है कि कड़ी धूप में लंबा इंतजार करने के बाद दर्जनों मतदाता बिना मतदान किए ही घर को वापस चले गए। यही नहीं बल्कि सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने तो सीधा आरोप मढ़ते हुए कह दिया कि मशीनों में खराबी जानबूझकर कराई गई है। वैसे तो इस तरह के आरोप पहली बार नहीं लग रहे हैं, इससे पहले पिछले आम चुनाव में भाजपा की अप्रत्याशित जीत के चलते भी ईवीएम पर सवाल खड़े किए गए और उससे पहले जब भाजपा विपक्ष में थी तो कांग्रेस की तत्कालीन सरकारों पर ईवीएम के साथ छेड़छाड़ के आरोप लगाती रही। इस प्रकार आरोप नए नहीं हैं। गुजरात विधानसभा चुनाव में भी ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप युवा पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने लगाए थे। तब उन्होंने कहा था कि सूरत, राजकोट और अहमदाबाद में ईवीएम में छेड़छाड़ की गई। तर्क यह दिया गया था कि जहां मशीनों से छेड़छाड़ की गई वहां हार-जीत का अंतर काफी कम रहा है। इसी प्रकार कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान प्रदेश भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा ने अनियमितताओं का आरोप लगाया, जबकि कांग्रेस नेता एवं राज्य के उपमुख्यमंत्री जी परमेश्वर ने भाजपा पर ईवीएम से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया था।

खास बात यह रही कि इन तमाम आरोपों से पहले मार्च प्रारंभ में ही कर्नाटक चुनाव आयोग ने घोषणा कर दी थी कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ करने का अगर कोई दावा करता है और उसे साबित नहीं कर पाता तो उसे छह माह की जेल की सजा का प्रावधान होगा। इस आशय की बात राज्य चुनाव आयोग के अध्यक्ष संजीव कुमार ने मीडिया से कही थी। इसका अर्थ यह निकाला गया कि चुनाव आयोग अपनी छवि बचाने के लिए किसी भी स्तर पर जाने को तैयार है, जबकि सियासी पार्टियां और नेता सिर्फ अपनी जीत साधने की खातिर किसी भी तरह के आरोप लगाने से पीछे हटते नहीं दिख रहे हैं। अगर याद हो तो गड़बड़ी के बड़े-बड़े दावे तो आम आदमी पार्टी ने भी किया था और चुनाव आयोग के समक्ष ईवीएम से छेड़छाड़ के सुबूत पेश करने का समय भी मांगा था, लेकिन इसके बाद क्या हुआ वह भी सभी जानते हैं।

चुनाव आयोग की अपनी शर्तें और मजबूरियां आप को ऐसा करने नहीं देतीं और न ही दावा करने वाले ही वो सब कर सकते हैं जैसा कि चुनाव आयोग चाहता है। अत: बात जहां से शुरु होती है वहीं खत्म भी हो जाती है और वोटिंग मशीनें हैं कि अब उन पर तेज धूप का भी असर साफ देखने को मिल रहा है, जबकि बारिश, पानी का तो पहले भी असर होता ही रहा है, क्योंकि जब मशीन इलेक्ट्रॉनिक है तो इन सब का असर तो होगा ही होगा, लेकिन कोई यह कहे कि जानबूझकर मशीन को लू लगा दी गई या उसमें इतना पानी का छिड़काव कर दिया गया कि मन माफिक नतीजे लाए जा सकें तो हैरानी होती है।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाने की दिशा में बेहतर काम किए जाने चाहिए, लेकिन इस तरह से नहीं कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिंह लगने लगें। वैसे भी आरोप लगाने वालों के लिए यह विचारणीय होना चाहिए कि विभाग में एक या दो लोग व्यक्ति तो किसी के समर्थक हो सकते हैं और वो उसे लाभ पहुंचाने की कोशिश भी कर सकते हैं, लेकिन पूरे तंत्र को ही किसी विशेष विचारधारा का हिमायती बता देना सही मायने में संगीन अपराध की श्रेणी वाला कृत्य ही माना जाना चाहिए। जहां तक उत्तर प्रदेश का मसला है तो यहां वाकई मशीनें खराब हुई हैं और इसलिए जिम्मेदार लोगों को इसे संज्ञान में लेते हुए उचित कदम उठाए जाने चाहिए। इसमें किन्तु-परन्तु जैसे शब्दो को स्थान नहीं होना चाहिए।

खासतौर पर तब जबकि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव चिंता जाहिर करते हुए ट्वीट करते हैं और कहते हैं कि 'हज़ारों ईवीएम में ख़राबी की शिकायतें आ रही हैं। किसान, मज़दूर, महिलाएँ एवं नौजवान भरी धूप में अपनी बारी आने के इंतज़ार में भूखे-प्यासे खड़े हैं। यह तकनीकी ख़राबी है या चुनाव प्रबंधन की विफलता या फिर जनता को मताधिकार से वंचित करने की साज़िश। इस तरह से तो लोकतंत्र की बुनियाद ही हिल जाएगी।' इससे पहले जब उन्हें मालूम चला कि ईवीएम खराब हो रही हैं तो उन्होंने कहा था कि आज कहा जा रहा है कि गर्मी के कारण ईवीएम मशीन काम नहीं कर रही हैं। कल कहेंगे बारिश और ठंड की वजह से ऐसा हो रहा है। कुछ लोग जनता को लाइन में खड़ा रखकर अपनी सत्ता की हनक दिखाना चाहते हैं। हम पेपर बैलेट वोटिंग की माँग को एक बार फिर दोहराते हैं। इस प्रकार की मांग समझ में आती है, क्योंकि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए जरुरी हो जाता है कि जनादेश सही-सही प्राप्त हो और उसमें किसी प्रकार को कोई दबाव या छेड़छाड़ की रत्तीभर भी गुंजाइश न हो। इसलिए यदि बहुतायत में ईवीएम खराब हो रही हैं तो उसका विकल्प भी तलाशा जाना चाहिए, क्योंकि यह न सिर्फ चुनाव आयोग की विश्वसनीयता का सवाल है बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करने का भी सवाल है।

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