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ताकि शरीर में रहे सकारात्मक ऊर्जा

आज का मानव बाहरी दुनिया की चकाचौंध के कारण अपने अस्तित्व को ही भूल गया है। हद यह है कि वह अपना मानव धर्म ही भूल गया है और समाज जैसे अपने मूल स्रोत से कटकर अंधकार में जीने को विवष हो रहा है।  इस भटकाव से मानव को यदि कोई बचा सकता है तो वह उसका अपना धर्म ही है। ऐसा धर्म-कर्म जो मानव को शांति प्रदान करता हो।  यह वही धर्म है जो मानव को अपने स्वयं के उत्तरदायित्वों से लेकर परिवार, समाज और देश के साथ ही साथ विश्व के प्रति दायित्वों का बोध कराता है। ऐसे में यदि संसार का प्रत्येक मानव यह भलीभांति समझ ले कि उसका अपने प्रति, समाज के प्रति, राष्ट्र और विश्व के प्रति क्या उत्तरदायित्व है तो सारे विवाद स्वत: ही सुलझ जाएंगे और खुशहाली व प्रसन्न्ता का दौर पुन: प्रारंभ हो जाएगा।  मानव में यह परिवर्तन तभी संभव है जबकि उसके अपने विचारों में परिवर्तन आए। इसलिए यह जरूरी हो गया है कि दूसरे को सुधरने की शिक्षा देने की बजाय हम अपने आपको वैचारिक धरातल पर ले जाकर सुधारने की कोशिश करें। जग स्वत: सुधरता नजर आ जाएगा। हमें स्वत: हर संभव कोशिश करना चाहिए कि मन में सकारात्मक विचारों को पोषित किया जा सके ताकि हमारा व्यक्तित्व सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण हो सके।

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