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जलस्रोत माँ के दूध की तरह छलकने लगे हैं

जलस्रोत माँ के दूध की तरह छलकने लगे हैं , जिलाधिकारी का प्रयास रंग लाया

किसी भी जिले एवं अंतर्गत आने वाले ग्रामीण इलाके के जन हेतु जीवन नदी होती है। चित्रकूट जिले की मंदाकिनी नदी सिर्फ एक सामान्य नदी ही नहीं बल्कि माँ गंगा की तरह तुलनात्मक आध्यात्मिक महत्व रखती है।कामतानाथ की महिमा माँ मंदाकिनी की अविरल धारा से ही अविरल है। किन्तु जब से नदी संकटग्रस्त हुई तो ना सिर्फ आध्यात्म को हानि हुई बल्कि यहाँ के किसानों को भी खूब हानि हुई।ग्रामीण इलाके के पशु - पक्षी सहित किसान परिवार का जीवन भी इस नदी पर आश्रित रहा है। नदी शनैः शनैः सूखती रही तो समृद्धि भी सूखती रही और गरीबी में तब्दील होती रही। खेती - किसानी पर बड़ा असर पड़ने लगा तो पीने के पानी की किल्लत से ना सिर्फ गांव के लोगों को जूझना पड़ा बल्कि शहरी क्षेत्र के लोगों को भी उचित मात्रा में शुद्ध जल के लाले पड़ने लगे हैं।

मंदाकिनी के पुनर्जीवन हेतु सर्वोदय सेवा आश्रम के अभिमन्यु भाई ने नदी समाज का निर्माण कर गांव के लोगों से संवाद प्रारंभ किया। इस संवाद कार्यक्रम से पत्रकारिता क्षेत्र के लोग भी जुड़ने लगे , जिसमें बुंदेलखण्ड कनेक्ट के समाचार विश्लेषक सौरभ द्विवेदी ने समाज हेतु भूमिका का निर्वहन किया। भाजपा के जिला उपाध्यक्ष चंद्रप्रकाश खरे दलीय निष्ठा से ऊपर उठकर समाज के साथ चल नदी पुनर्जीवन हेतु सहयोग प्रदान किया। इसी प्रकार सुनील गर्ग जैसे युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका से बड़े बुजुर्ग भी अभियान में भागीदार हुए , जिनमें पूर्व ब्लाक प्रमुख आरडी सिंह भी संवाद कर लोगों को जागरुक करते रहे। इस बीच जिले में नवागन्तुक जिलाधिकारी विशाख जी ने मंदाकिनी पुनर्जीवन अभियान को हृदय से महसूस कर सरकारी स्तर से ब्लाक वार मनरेगा द्वारा खुदाई शुरू कराकर अतुलनीय योगदान प्रदान किए। हालांकि फिर राजनीतिक अमला भी हरकत में आया तो सांसद बांदा एवं सदर विधायक ने भी भूमि पूजन कर अभियान को धार प्रदान की।

कार्य उत्तम तरीके से हो और मजदूरों का प्रोत्साहन हो अतएव भागीरथ बने मजदूरों को सम्मानित किया जाना भी आवश्यक कार्य था। इसलिये अब साइकिल यात्रा द्वारा अभिमन्यु भाई मजदूरों को प्रणाम करने व श्रमदान के लिए लोगों को जागरूक करने निकल पड़े हैं। सूरजकुंड से शुरू यह यात्रा देवल पहुंच चुकी है। जहाँ नदी की मिट्टी से मजदूरों का तिलक किया गया तो वहीं इन भागीरथों को प्रणाम भी किया गया। हर्ष की बात यह है कि फावड़ा इतना चला कि इस गर्मी में ही जलस्रोत माँ के दूध की तरह छलकने लगे हैं। यह काम सुचारू रूप से चलता रहा तो निश्चित रूप से बारिश के मौसम के बाद नदी पूरे सबाब पर होगी।

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