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शांति का मार्ग प्रशस्त करने भारत-पाक रिश्तों की दुहाई

चीन ने एक बार हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा लगाते हुए हिन्दुस्तान की पीठ पर खंजर घोंप दिया था, जिसके जख्म आज तक भर नहीं पाए हैं। जी हॉं हम बात वर्ष 1962 में भारत और चीन के बीच हुए युद्ध की ही कर रहे हैं, जिसमें भारत की बुरी तरह हार हुई थी। तब चीन की हर रणनीति सफल होती दिखाई दी और भारत विफल होता गया, क्योंकि उसके भरोसे पर हमला हुआ था, इसलिए न तो वह जवाबी कार्रवाई कर पाया और न ही कुछ बोल ही पाया। तब सवाल खड़े हुए कि आखिर इस नाकामी का ज़िम्मेदार कौन था, क्या प्रथम प्रधानमंत्री पं जवाहरलाल नेहरू इसके लिए जिम्मेदार ठहराए जा सकते हैं या मेनन या फिर कोई और? इस पर तब से लेकर आज तक अनेक आंकलन हुए हैं और आगे भी होते रहेंगे, लेकिन हकीकत यही है कि युद्ध में नहीं बल्कि भरोसे को तोड़कर हमें हराया गया।

यहां चीन की बात कौन करे हमारे अपने शरीर का एक अंग जो आजादी के साथ ही अलग हुआ वह भी तो लगातार भरोसे पर वार करता चला आ रहा है। वह पाकिस्तान ही है जिसके कर्ताधर्ता विभाजन के बाद से आए दिन अपने कर्म और वचन से हम भारतियों का दिल छलनी करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रख रहे हैं, बावजूद इसके आम हिन्दुस्तानी नहीं चाहता कि पड़ोसी मुल्कों से रिश्ते बिगड़ें और सीमा पर युद्ध जैसे हालात बनें। यहां अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि जहां जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान ने आतंकवादियों की घुसपैठ जारी रखते हुए लगातार सीजफायर का उल्लंघन किया है तो वहीं चीन ने डोकलाम विवाद को लेकर सदा ही आंख तरेरने का काम किया है। ऐसे में विश्वास किया जाए तो आखिर किस पर किया जाए, क्योंकि यहां बोला कुछ और जाता है, और हो कुछ और जाता है। मतलब साफ है कि कथनी और करनी में अंतर के चलते परिणाम भी संभावनाओं के विपरीत ही आते हैं। अगर यकीन नहीं आता तो पिछली अटल सरकार के दौरान भारत-पाक रिश्तों की डींगें हांकते नेताओं के बयान और उसी बीच कारगिल घटनाक्रम पर नजर डाल लें स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।

भारत पाक संबंधों को लेकर तो एक अलग तरह का खेल खेला जाता है, जिसके तहत पाकिस्तान की मौजूदा सरकार कभी भी संबंध बेहतर बनाने की दिशा में आगे बढ़ती हुई दिखाई नहीं देती है। मजबूरी या दबाव में यदि वह वार्ता के लिए तैयार भी हो जाती है तो कट्टरपंथियों के दखल और भय से वह अपने ही कौल से फिर भी जाती है। इसका जीता जागता उदाहरण राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ और उनका शासनकाल रहा है। पाक मामले में यह भी सत्य है कि पद छोड़ने के बाद इन नेताओं और अधिकारियों की भाषा भी बदली हुई नजर आती है। ये लोग ऐसे-ऐसे राज खोलते दिखते हैं मानों उनसे बड़ा भारत का कोई दूसरा हितैषी है ही नहीं। यकीन नहीं आता हो तो पाकिस्तान के पू्र्व राष्ट्रपति मुशर्रफ के बयान को ही देख लें, जिसमें वो बता रहे हैं कि उनके शासनकाल में तो भारत और पाकिस्तान शांति और सुलह के रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे। अब जरुर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शांति वार्ता की वकालत नहीं करते हैं। ऐसा कहते हुए मुशर्रफ शायद भूल गए तो उन्हें याद दिला दें कि आगरा सम्मिट के दौरान जब बात संबंधों के बेहतर बनाने की हुई तो उन्होंने ही कह दिया था कि वो इस तरह के समझौते पर हस्ताक्षर तो कर दें, लेकिन फिर क्या वो पाकिस्तान में रह पाएंगे, क्योंकि उसके बाद कट्टरपंथी उन्हें पाकिस्तान में रहने नहीं देंगे और तब भारत सरकार से मांग करने पड़ेगी कि वो उनके बाप-दादाओं की नई दिल्ली स्थित नाहर वाली हवेली उन्हें दे दें, ताकि बाकी दिन वो वहां गुजार सकें।

देश का नेतृत्व करने वाले की यह भाषा बताती है कि पाकिस्तान में अगर किसी की चलती है तो वह सिर्फ ओर सिर्फ कट्टरपंथी ताकतें ही हैं, जिनके कहने पर सेना तक अपने क्रिया-कलाप चलाती है। अब चूंकि पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ ने यह बात स्वीकार की है कि उन्होंने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ मनमोहन सिंह सरकार से शांति और सद्भाव के लिए वार्ता की थी, क्योंकि दोनों नेता अलग-अलग राजनीतिक दल से होने के बावजूद विवादों से आगे बढ़ना चाहते थे। इस मामले में वर्तमान मोदी सरकार थोड़ा हटकर है, क्योंकि इस दिशा में उसने एक भी कदम आगे नहीं बढ़ाया है। ये तमाम बातें देशद्रोह के आरोप का सामना कर रहे 74 साल के मुशर्रफ दुबई में बैठकर कह रहे हैं, इसलिए समझा जा सकता है कि जिसके अपने पैरों तले की जमीन खिसक चुकी है, वो आखिर इसी तरह की जमीनी बातें कर सकता है। जबकि हकीकत तो यही है कि पाकिस्तान कभी भी नहीं चाहेगा कि उसके संबंध पड़ोसी से बेहतर हों, क्योंकि ऐसा करने के बाद आवाम को मालूम चल जाएगा कि उसकी सरकार तो निकम्मी साबित हुई है, जिसने भ्रम फैलाकर राज तो किया, लेकिन देश गर्त में जाता चला गया। इसलिए पाकिस्तान के जिम्मेदार लोग वार्ता शुरु होने से पहले ही उससे हटने की जुगत भिड़ाना शुरु कर देते हैं, यही हकीकत है और इसे कोई झुठला भी नहीं सकता है।

अंतत: पाकिस्तान के कर्ता-धर्ता यदि वाकई शांति के मार्ग को प्रशस्त करना चाहते हैं तो उन्हें रिश्तों की दुहाई देने की आवश्यकता ही नहीं है, क्योंकि भारत सदा से शांतिप्रिय देश रहा है और उसे पड़ोसियों से मित्रवत संबंध बनाए रखने में किसी तरह की कोई परेशानी भी नहीं होती है। इस मामले में पाकिस्तान को समझना होगा कि जब हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा।

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