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अब सरकारी मंडियो में दम तोड रहे किसान

किसान एक ऐसी प्रजाति बन रही है कि वह जहाँ भी जाता मौत उसका पीछा करती। भयानक सूखे और प्राकृतिक आपदा व कर्ज की फांस किसानों की आत्महत्या की खबरें आम हो चुकी हैं ; तो वहीं अब सरकारी मंडिया भी किसानों की कब्रगाह बन रही हैं। मध्यप्रदेश के नरसिंह पुर से खबर मिली कि किसान को भीषण गर्मी में तीन दिन से अधिक इंतजार करना पड़ा। इस तड़पाती गर्मी में घरों के अंदर राहत नहीं तो फिर वह मंडी स्थल है। जहाँ गरीब के घर जैसा सुख भी नहीं है। सरकारी सिस्टम की पेचीदगी यही है कि सुविधा की जगह दुविधा उत्पन्न कर देता है। समस्या सुलझाने के सिवाय हर आपदा को जन्म देने का नाम है। अब मंडियों में किसानों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है और सरकारी बाबू किसानों को खूब तड़पाते हैं।

कहीं - कहीं से ऐसी भी खबरें आईं कि तौल में शीघ्रता के नाम पर संबंधित कर्मचारी द्वारा वसूली भी की जाती रही। एकाध जगहों पर बड़े अधिकारियों ने कार्रवाई भी की। किन्तु घूसखोर व लापरवाह कर्मियों को भय नहीं रहता। मानवता भी कहीं खोई सी जा रही है। नेताओं की बात दूजी है परंतु अफसर समझ सकते हैं कि देश का किसान किन विपरीत परिस्थिति में फसल उत्पादन करते हैं और उस पर भी विक्रय के समय धूप और लू के थपेड़े सहेंगे तो कमजोर किसान मृत्यु के गाल में ही समाएंगे। अफसोस जनक है कि सरकार ही योजना बनाती है परंतु धरातल पर पारदर्शिता के साथ तेज गति से क्रियान्वयन में असफल सिद्ध होती है। जबकि बेरोजगारी इतनी है कि ऐसे कार्यों में बेरोजगार युवाओं से लेकर मजदूरों को अधिक तादाद में रोजगार देकर सुविधा मुहैया करायी जा सकती है। जिसके फलस्वरूप किसानों की जिंदगी बचाई जा सकती है और भारत की अस्मिता बची रह सकती है।

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