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आए दिन होती हिंसक घटनाओं के पीछे का रहस्य

सड़क से गुजर रहा था , अचानक से नजर पड़ी कि कुछ लोग कबाड़ बीनने वाले युवा को पीट रहे हैं। इस तरह से उसके थप्पड़ जड़े जा रहे थे कि कोई भी दर्शक जीवन दर्शन को महसूस करने वाला हो तो यकीनन पसीज जाएगा। समीप में थाना था , लगभग 50 मीटर की दूरी पर थाना है फिर भी लोगों की इतनी हिम्मत की एक कबाड़ी को पीटते जा रहे हैं। मन में सवाल जन्मा आखिर क्या किया होगा इसने ? क्यों सभ्य कहलाने वाले लोगों को गुस्सा आया और वे तड़प ' थप्पड़ ' से निकाल रहे हैं। समीप में जान पहचान की आंटी खड़ी थीं। मैं पूंछ बैठा कि आंटी क्या हुआ ? उन्होंने बताया कि ये जो छोटा सा बच्चा खड़ा है , इसे कबाड़ी ने कहा था कि चलो कबाड़ बिनवा दो तुम्हे 10 ₹ दूंगा। वो बच्चा लगभग 10 वर्ष के आसपास की उम्र का दिख रहा था। उस कबाड़ी युवा ने बच्चे को दस ₹ मांगने के बावजूद नहीं दिए। ऊपर से सड़क पर ही छोटे से बच्चे को लिटाकर पीटा भी , यह दृश्य मैंने नहीं देखा था। मैंने जो देखा वही कि युवा कबाड़ी पीटा जा रहा है और मन पसीज जाना जायज था। किन्तु जब मुझे सच्चाई का पता चला तो मेरे अंदर भी उस कबाड़ी के लिए क्रूरता के भाव जन्म लेने लगे और मूक समर्थन देने लगा कि अगर ये इतने छोटे बच्चे को पीट सकता है तो यकीनन देखने वालों ने दो - चार थप्पड़ जड़कर पैसे दिलवाकर बुरा कृत्य नहीं किया। सिवाय इतने के कानून हाथ में ले लिए पर यह कानूनी मसला है नाकि मानवीय !

ऐसे ही तमाम न्यूज चैनल्स पर खबरों का अंबार लगा है कि दबंगों ने इसे पीटा , उसे पीटा और चीख चिल्ला कर दलित शब्द का प्रयोग किया जाता है। जबकि सच है कि कुछ मामलों में नाम लेने से इनकी जुबान पर ताला लग जाता है और दांत पसीज कर समुदाय आदि लिख - बोल कर अदृश्य हो जाते हैं। चैनल वाले भइया - बहिनी लोग एक पक्ष दिखा कर एवं मनमाफिक शब्द का प्रयोग कर लगातार देश को नफरत की आग में झुलसने के लिए तैयार कर रहे हैं। इसके पीछे इनका एजेंडा सेट रहता है कि फला सरकार बदलनी है और जनता को भयानक दृश्य दिखाकर ही संभव हो सकता है।

अगर किसी मामले का हर पक्ष दिखाया जाए तो उपरोक्त घटना के आधार पर मनुष्य के अंदर करूणा एवं क्रूरता के भाव का जन्म घटनाक्रम के अनुसार होता है। इसे बड़े सरल तरीके से समझाया जा सकता है कि कोई मूवी देखते हुए कितनी बार हास्य , करूणा , क्रूरता एवं दया के भाव एक ही हाल में बैठे हुए लोगों के अंदर जन्म लेते हैं फिर विश्लेषण इस परिप्रेक्ष्य में होना चाहिए कि यह घटना कब क्यों और कैसे घटित हुई ? पूर्ण विश्वास है कि मानवता आज भी उतनी ही जिंदा है जितनी कि क्रूरता की घटनाएं नजर आती हैं। जाति विशेष और धर्म विशेष आदि के लोग भी उतने ही मानवीय स्वभाव के हैं , जितना की हर मानव होता है। एहसास का धन सबको एक समान मिला हुआ है सिवाय विक्षिप्त एवं अपवाद स्वरूप लोगों को छोड़कर। इसलिये वक्त की जरूरत है और चैनल्स की जिम्मेदारी है कि हंगामा ना खड़ा कर के घटना के हर पहलू को समझें फिर जनता को रूबरू कराएं कि पिटने वाला और पीटने वाले के मध्य क्या कुछ घटित हुआ था ? दुश्मनी का भाव भी जाति - धर्म नहीं देखता बल्कि ज्वालामुखी धधकने की तरह है।

अतः देश की जनता को स्वच्छ - स्वस्थ और सुंदर समाज बनाने के लिए स्वयं संवाद करना होगा और गलत दृश्य दिखाए जाने का सहज सबूतात्मक विरोध भी दर्ज कराना होगा वरना इस दौर में देश को दौरे पड़ते रहेंगे , वजह इत्ती सी कि दौरे पड़ने वाले हालात को स्वतः ही जन्म दिया जा रहा है। सत्ता परिवर्तन से ज्यादा मन परिवर्तन की जरूरत है , जो जीवन दर्शन के संवाद से ही संभव है। शेष भारत के सीने पर वरदहस्त मिशनरीज ने कीलें तो खूब ठोकी और कमियां हमारे समाज में भी रही हैं।

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