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चुनावी चर्चा में पूर्व और वर्तमान प्रधानमंत्री की आमद के निहितार्थ

देश में जैसे-जैसे आम चुनाव का समय करीब आता जा रहा है, चुनावी रणनीतिकारों के साथ ही साथ विश्लेषक और समीक्षकों समेत आलोचकों का बाजार भी गर्म होता जा रहा है। जहां रणनीतिकार जीत और हार के फार्मूले सुझाते नजर आ रहे हैं तो वहीं विश्लेषकों ने पूर्व और वर्तमान परिदृष्य में मतदाताओं के रुझान का विश्लेषण करना भी शुरु कर दिया है। इसी आधार पर बताया जा रहा है कि यदि समय से पहले लोकसभा चुनाव कराए जाते हैं तो भाजपा को खासा फायदा हो सकता है, जबकि तय समय पर चुनाव होने से कांग्रेस गठबंधन के साथ आगे निकल सकती है। ऐसे में जबकि कांग्रेस अन्य विपक्षी पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतरने को अपना ध्येय बना चुकी है, तो जितना समय इस गठबंधन को मजबूत करने को मिलेगा, भाजपा के लिए उतनी ही मुसीबतें खड़ी होती चली जाएंगी। यकीन नहीं आता तो जीएसटी, कालाधन, महंगाई, तेल के बढ़ते दाम, महंगाई, केंद्रीय जनहितकारी योजनाओं का फेल हो जाना और आधार कार्ड से लेकर नोटबंदी के बाद से बैंकिंग सेवाओं का संकट बढ़ते जाना। ऐसे मुद्दे हैं जिनके जवाब देना मोदी सरकार को मुश्किलों में डाल सकता है।

घरेलु मुद्दों को यदि छोड़ दें तो विदेशी मामलों में भी सरकार अच्छी-खासी घिरती नजर आती है। इसलिए अनेक विश्लेषकों समेत मीडिया ने भी इसी वर्ष अंत तक होने वाले अनेक राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ लोकसभा चुनाव भी संपन्न करने की सलाह दे दी थी, लेकिन तैयारियों को लेकर समय की कमी और अन्य संवैधानिक पैंचों के चलते यह संभव नहीं हुआ। अब तो सत्ता पक्ष के लोगों ने ही कह दिया है कि राज्य और केंद्र के चुनाव एक साथ नहीं करवाए जा सकते हैं। जहां तक समीक्षकों का सवाल है तो वो किसी को गिराने या उठाने की बजाए वास्तविक स्थिति जनता के समक्ष रखने की कोशिश करते देखे जा रहे हैं और चेताने की कोशिश भी कर रहे हैं कि मोदी सरकार ने जो काम किए वो पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार के सामने कुछ भी नहीं हैं, इस आधार पर मतदाता वर्तमान सरकार से रुष्ट भी हो सकता है। ऐसे में समीक्षक देश और विदेश के तथ्यों और घटनाओं को भी सामने रखने का काम कर रहे हैं,  लेकिन आलोचकों का क्या वो तो किसी एक पक्ष को लेकर ही बात करते हैं। जो सत्ता के साथ हैं उन्हें विरोधियों में बुराई नजर आती है और जो विपक्ष में हैं वो सत्ता पक्ष के खिलाफ जहर उगलने का ही काम करते हैं।

इस सरकार ने पिछली सरकार की अपेक्षा क्या क्या गलत किया, इसे लेकर सरकार की आलोचनाओं का काम इनके पास बहुतायत में होता है। इसी आधार पर चुनावी चर्चा चल निकलती है और कोशिश की जाती है कि इसी से जीत-हार सुनिश्चित कर आगामी सरकार का खाका खींच दिया जाए। ऐसे सटीक पूर्व अनुमान आमजन के समक्ष पेश किए जाएं कि असली परिणाम भी लोग भूल जाएं। इन्हीं के जरिए किसी के प्रति लहर बनाने का काम भी बखूबी किया जाता है। बहरहाल इसके लिए जरुरी हो जाता है कि पूर्व और वर्तमान सरकार के कार्यों की खुलकर समीक्षा की जाए। यह तभी संभव है जबकि आपके पास अकाट्य  तथ्य हों जिनकी काट किसी और के पास न हो। ऐसे ही लोगों ने इतिहास के उन पन्नों को पलटने का प्रयास किया है जिससे यह बतलाया जा सके कि वर्तमान सरकार से पूर्व की मनमोहन सरकार ज्यादा अच्छी रही है। इसके लिए अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल और उनका पू्र्व प्रधानमंत्री के प्रति सम्मान का उल्लेख किया जा रहा है।

दरअसल अब बताया जा रहा है कि जो सम्मान पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से हासिल हुआ उसे भारतीय मीडिया ने देशवासियों को दिखाने का काम ही नहीं किया। गौरतलब है कि राष्ट्रपति पद से निवृत्त होते हुए ओबामा ने अपने कार्यकाल की शानदार यादों और प्रगाढ़ संबंधों को खूबसूरत तस्वीरों के जरिए एक एल्बम की शक्ल में दुनिया के समक्ष पेश किया था। खास बात यह रही कि ओबामा ने इसे अपनी आख़िरी ‘फॉर्मल स्टेट अराइवल सेरेमनी’ के समय उजागर किया, जिसे व्हाइट हाउस ने जारी किया। अगर यह सब सच है तो यह भी हकीकत ही होना चाहिए कि इस एल्बम में दुनिया की पचास बड़ी हस्तियाँ और सबसे ईमानदार नेताओं की तस्वीरों को ससम्मान जगह दी गई। भारत के लिए यह कम सम्मान की बात नहीं है कि इस एल्बम में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और उनकी पत्नी की तस्वीर सबसे पहले स्थान पर लगाई गई है। इससे साफ होता है कि भारत के चौदहवें प्रधानमंत्री के तौर पर डॉ. मनमोहन सिंह को दुनिया इसलिए भी पसंद करती रही है कि वो एक विचारक और विद्वान व्यक्तित्व के धनी रहे हैं।

अर्थशास्त्री रहने के साथ जब वो उच्चतम पद पर पहुंचे तो उन्होंने अपनी नम्रता, कर्मठता और कार्य के प्रति प्रतिबद्धता को कम नहीं होने दिया। इस कारण देखने वालों ने देखा कि जो व्यक्ति काम करता है वह बड़े-बड़े वादे नहीं करता और न ही अपनी बातें सुना-सुना कर लोगों को भ्रमित करने का ही काम करता है। उसके तो काम बोलते हैं और उसका अपना व्यवहार उसकी पहचान बन जाता है। प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए भावनाओं में बहने और दूसरों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश कतई नहीं होनी चाहिए। जहां तक चुनावों का सवाल है तो यह लोकतांत्रिक देश के चुनाव हैं, जहां आज किसी के पास सत्ता है तो कल किसी और के हाथ में सत्ता की बागडोर हो सकती है। इसलिए सत्ता के नशे में चूर होकर दुनिया के सामने देश की छवि खराब करने से बेहतर है कि अपने विकासवादी कार्यों से सभी का दिल जीता जाए। वैसे भी चुनाव अब करीब आते जा रहे हैं, इसलिए अब जो भी किया जाए वह जनादेश को देखते हुए ही किया जाए, वर्ना हमारे देश का मतदाता इतना समझदार है कि फैसले पलटते समय वह किसी को भनक भी नहीं लगने देता है।

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