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चुनावी समय तक संक्रमण काल रहेगा सावधान

सच कहूँ समझ में नहीं आता कि अब लिखें क्या ? सहज - सरल मन से जो कुछ भी होता लिखता रहता। अब सहजता सरलता यहाँ शेष नहीं रही। विश्वास भी है कि चुनावी समय तक संक्रमण काल बना रहेगा। कुछ समस्याएं खुद भी हैं। जिस समाज और देश में मानवता और आतंकवाद के बीच विभाजन रेखा ना खिच सकी हो सोचने-समझने लायक है कि समाज किस स्थित में खड़ा है ? राष्ट्र की राजनीति और राष्ट्रनीति की क्या दिशा और दशा है ? राजनीति इतनी कमजोर हो कि मानवता के नाम पर ढोंग कर राष्ट्र को नुकसान पहुंचाने वाले समूह व समुदाय को शरण देने में बेजा सहयोग करें और इसमें वैश्विक संस्था का षणयंत्र एवं पेशेवर कलाकारों का सहयोग प्राप्त हो। ऐसे हालात में राष्ट्र के आंतरिक हालात भविष्य में कैसे अच्छे हो सकते हैं ? अब सिर्फ सवाल हैं , क्योंकि देश के हालात सवालों वाले रह गए हैं ? जवाब कौन देगा ?

जवाबदेही किसी की तय ही नहीं ! राज नेता सत्ता की प्यास में पपीहा बने हुए हैं और ऐसे पपीहा बन गए कि झुंड के झुंड निकलने - दिखने लगे हैं और अपनी ही प्यास से तृप्ति पाने हेतु पपीहे की तरह आवाज दे रहे हैं , जब प्यास ही नहीं बुझ रही तो आंतरिक हालात अच्छे होने की परिकल्पना भी कैसे कर सकते हैं ? मानवता को भी सत्ता प्राप्ति का हथियार बना लेते हैं और भारत को ऐसा धर्मशाला बनाकर रख दिया कि पहले से चहल - पहल बहुत है , गंदगी का अंबार है , पानी की कमी है , बिजली का ठिकाना नहीं और चली गई तो 44 डिग्री के तापमान में मनुष्यों की गर्मी से बढ़े हुए तापमान में जल - भुन कर मर जाओ। कश्मीरी पंडित विस्थापित हुए , बांग्लादेशी घुसपैठिए और रोहिंग्या बसाए जा रहे हैं। वजह वोट है , जिससे धर्म विशेष का आवश्यकता से अधिक हित साधने वाला दल कोई तरह तो सत्ता में आए ? मानवता मनुष्य का मूल है , किन्तु यह कैसी मानवता है ?  जो देश की बहुत बड़ी आबादी में कुछ और आबादी प्लस कर अस्त व्यस्त जीवन को पस्त कर दे।

सचमुच कुछ समझ में नहीं आता कि इस देश का विकल्प क्या है ? इस देश की वास्तविक नैया पार कौन कर सकता है ? जो राष्ट्र हित में जनसंख्या नियंत्रण से लेकर रोजगार मुहैया कराए और जीवन स्तर उच्च हो , जो बेवजह की बहस ना कर तार्किक बात करे और विश्व के  मिशनरीज को दरकिनार कर राष्ट्र हित पर कडे निर्णय ले। शायद वर्ल्ड बैंक का धन बहुत बड़ी वजह हो कि सत्ता पर पहुंचते ही सशक्त नेतृत्व वाला भी शक के घेरे में आ जाता है कि आखिर कर क्या रहे हो ? इस देश के वास्तविक हालात को देखते हुए महसूस होता है कि सत्ता व सम्पूर्ण व्यवस्था पर कोई गहरा लोचा है। जो आम जनता की समझ और पहुंच से बहुत दूर है।

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