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आम चुनाव साधने की जुगत भिड़ाती मोदी सरकार

देश में आम चुनाव अगले साल होने हैं, लेकिन इन्हें साधने का काम तमाम राजनीतिक पार्टियों और प्रमुख नेताओं ने बहुत पहले से शुरु कर रखा है। इसके चलते जहां राजनीतिज्ञ एक दूसरे की कब्र खोदते नजर आते हैं तो वहीं दूसरी तरफ सत्ता पक्ष अपने ही किए गए गढ्ढों को भरने की फिराक में हर कुछ करता नजर आ रहा है। इस पर जनता को लुभाने की खातिर सत्ता पक्ष अपनी योजनाओं और उनके क्रियान्वयन वाले पिटारे से उपलब्धियों को खोजने का काम भी बदस्तूर कर रहा है, ताकि सरकार की उपलब्धियां गिनाने में कोई कसर बाकी नहीं रहने पाए। यहां विपक्ष है कि आमजन को बताने का भरसक प्रयास कर रहा हैं कि इस सरकार में काम कुछ नहीं हुआ, जो हुआ है वह 'मन की बात' ही हुई है, जबकि मोदी सरकार और उनके नुमाइंदों ने सुनने का कोई कालम ही नहीं रखा। जोर-शोर से बताया जा रहा है कि विपक्ष की कौन बात करे यहां तो मोदी सरकार ने अपने सहयोगियों तक को विश्वास में लेकर कोई काम नहीं किया। यही वजह है कि शिवसेना जब देखो तब सरकार की टांग खिंचाई में व्यस्त दिखती है तो वहीं अन्य पार्टियों के मुखिया भी अब अपने आपको ठगा हुआ बता रहे हैं और कुछ ने जहां भाजपा गठबंधन से किनारा करना शुरु कर दिया है तो कुछ अलग होने का मन बना चुके हैं। कुछ का तो कहना है कि सहयोगियों की क्या बात की जाए यहां तो भाजपा के ही वरिष्ठ नेता अपने आपको अपमानित महसूस कर रहे हैं और लगातार मोदी सरकार को निशाने पर ले रहे हैं। इन तथ्यों को हवा-हवाई बातें करार देकर मोदी सरकार अपना पक्ष रखने में जुटी हुई है।

दरअसल 26 मई 2014 को जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानंमत्री पद की शपथ ली और देश की बागडोर संभाली तब से आज तक ऐसे तमाम काम होने के दावे किए गए जो पिछले सालों में कतई नहीं हुए थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की सरकारों के कार्यकाल को मोदी के चंद चार साल के कार्यकाल से तुलना करने की बात भी खूब की जा रही है, लेकिन यह बात समझ से परे है कि तब के भौगोलिक और सामाजिक के साथ ही साथ राजनीतिक हालात बिलकुल ही अलग तरह के रहे हैं, जबकि आज आधुनिकता का देश में बोलबाला है तब प्रारंभिक काल के कार्यों की तुलना आज से कैसे की जा सकती है। फिर भी यदि प्रथम प्रधानमंत्री पं नेहरु के कार्यकाल के ही चंद महीने उठाकर मोदी सरकार के पलड़े के समानान्तर रख दिए जाएं तो मालूम चलता है कि वजनदारी पूर्व की सरकार की ही है। दरअसल याद करें आजादी के साथ विभाजन का दंश झेलते देश में शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने में तब सरकार को किस कदर कड़ी मेहनत करनी पड़ी थी। जबकि आज इसके विपरीत सत्ता पाने की चाहत में समाज व देश को धर्म और जाति के नाम पर बांटने से भी गुरेज नहीं किया जा रहा है। ऐसे में किस बात की तुलना की जा सकती है। जहां तक तकनीक का सवाल है तो मोदी शासनकाल में वो तकनीक देश को नहीं मिली जो कि राजीव गांधी के शासनकाल में मिल गई थी। इसी प्रकार दुश्मन बने पड़ोसी मुल्क को उसकी भाषा में जवाब देने का जो काम भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया वह आज तक मोदी सरकार से नहीं हो सका है।

परमाणु परीक्षण से लेकर चांद और मंगल में यान भेजने तक का सफर मोदी सरकार की अपनी उपलब्धियों में शुमार नहीं किया जा सकता हैं, क्योंकि इसकी नींव पूर्व की सरकारों के समय ही भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा रखी जा चुकी थी। इसलिए अब जो भी बात की जाए उस पर यह ध्यान जरुर दिया जाए कि जिस धरातल पर खड़े होकर उपलब्धियों को गिनाने का काम ये चंद नेता कर रहे हैं दरअसल उस धरातल को  उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण कार्य भी पूर्व की सरकारों के समय में ही संपन्न हुआ है। ऐसे में यह कहना भी पूरी तरह गलत होगा कि मोदी सरकार के समय कुछ भी नहीं हुआ, बल्कि सच तो यह है कि बहुत कुछ हुआ है, इसका सुबूत नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों से लिया जा सकता है, लेकिन यह अलग बात है कि इसके नतीजे आमजन को परेशान करने वाले रहे हैं। इससे हटकर जो हुआ वह सिर्फ बड़ी कंपनियों को लाभ पहुंचाने की गरज से होता हुआ नजर आया।

बीमा कंपनियों को खड़ा करने और उनके मुताबिक योजनाएं बनाने का ही काम ज्यादातर हुआ है। ऐसे में मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के हाथ में उपलब्धियां कागजी साबित होती हैं, जिनका फिलहाल जमीनी स्तर पर कोई लेना देना नहीं है। इसलिए मोदी सरकार कई ऐसे काम को करने की शुरुआत करने का दावा कर सकती है जो शायद पहले कभी नहीं हुए, क्योंकि उनके सुबूत न तो कोई उनसे मांगने वाला है और न ही वो ऐसा करने के लिए किसी के प्रति जवाबदेह ही हैं। यही वजह है कि मोदी सरकार अपनी तमाम योजनाओं के सहारे न्यू इंडिया बनाने की ओर देश को ले जाने का दावा कर रही है। केंद्रीय मंत्री अपने सोशल एकाउंट से सरकार की उपलब्धियों का प्रचार करने में जुट गए हैं। ऐसे में करोड़ों लोगों को सीधे फायदा पहुंचाने की बात भी जोर-शोर से की जा रही है, अब देखना यह है कि विपक्ष मोदी सरकार के इस प्रचार तंत्र को विफल करने में क्या तकनीक अपनाती है, क्योंकि यहां तो लहर में चुनाव जीत लिए जाते हैं।

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