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इस गर्मी में तेल के दामों से झुलसते इंसान को ठौर कहां?

मौसम करबट ले रहा है इसलिए खुद अपने ही रिकार्ड तोड़ने पर अमादा है। इसके चलते  इस बार की गर्मी अपने ही रिकार्ड तोड़ने को आतुर है। दरअसल पारा है कि 43 डिग्री के नीचे आने को तैयार ही नहीं है और उस पर सूरज मानों आग बरसाकर इंसानों को खाक करने की ठान रखे हो। कुछ इसी तरह का मामला केंद्र सरकार और पेट्रोलियम पदार्थों की आसमान छूती कीमतों को लेकर है। इसे देखते हुए कहना पड़ रहा है कि मोदी सरकार पेट्रोलियम पदार्थों के दामों को वाकई आसमानों को छूने तक ले जाएगी, ताकि उसके आगे और पीछे की सरकारें इस रिकार्ड को तोड़ न पाएं। यह अलग बात है कि वो इसकी सारी जिम्मेदारी तेल कंपनियों के सिर फोड़ती नजर आती है। बहरहाल याद करें वो समय जब केंद्र में यूपीए की मनमोहन सरकार थी, तब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अपने उच्चतम शिखर पर पहुंचीं थीं, जिसके बावजूद देश में पेट्रोल के दाम इतने नहीं थे, जितने की इन सामान्य दिनों में देखने को मिल रहे हैं।

उस समय विपक्ष में रहते हुए मोदी जी कहते देखे गए थे कि पेट्रोल के बढ़ाए गए दाम केंद्र सरकार की शासन चलाने की नाकामी का सबूत है। इससे जनता पर अनावश्यक बोझ बढ़ेगा। इसी आधार पर अब पूछा जाना चाहिए कि जीएसटी लागू करने के बावजूद पेट्रोलियम पदार्थों को उसके दायरे से बाहर रखना क्या इस सरकार की नाकामी को साबित नहीं करता है। जीएसटी लाने के समय से ही मांग उठती रही कि पेट्रोलियम पदार्थों को भी जीएसटी के दायरे में लाया जाए, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया और तब आरोप लगे कि चंद मुनाफाखोरों को लाभ पहुंचाने की गरज से सरकार ऐसा करने से बच रही है। अब जबकि मुंबई में पेट्रोल 84 रुपये प्रति लीटर से ऊपर जा पहुंचा है और मध्य प्रदेश में 83 रुपये के आस-पास है तो समझा जा सकता है कि आम इंसानों के लिए आने वाला समय कितना कष्टकारी होने वाला है। इसलिए कहा जा रहा है कि वर्तमान में देश और दुनिया में ऐसी कोई संकट की घड़ी नहीं आई है जिसके चलते देश में पेट्रोल और डीजल के दामों में तेज वृद्धि देखी जा रही है। इससे आमजन हैरान और परेशान है, क्योंकि इसका सीधा असर अन्य वस्तुओं एवं उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ता है।

सीधा सा गणित है कि जब लागत बड़ेगी तो वस्तु की कीमत भी बढ़ जाएगी। अब जबकि पेट्रोलियम पदार्थों के दाम आसमान को छू रहे हैं तो फिर माल-भाड़ा तो बड़ेगा ही बड़ेगा और उसी आधार पर खाद्य पदार्थों से लेकर अन्य आवश्यक वस्तुओं एवं उत्पादों के दाम भी बढ़ना तय हैं। यहां तेल कंपनियां कह रही हैं कि कीमतें उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव में आई बढ़ोतरी को देखते हुए ही बढ़ाई हैं। कंपनियों की यह दलील इस लिए हैरान करती है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पूर्व की मनमोहन सरकार के समय वाले दामों के आस-पास भी नहीं पहुंचे हैं। उस पर शंका पैदा करने के लिए इतना काफी है कि मई माह के मध्य से ही पेट्रोल डीजल के दाम अचानक क्यों उछाल मार रहे हैं, जबकि नई नीति के मुताबिक यह दाम तब भी बढ़ने चाहिए थे जबकि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव थे या कर्नाटक में चुनाव चल रहे थे। तब क्योंकर प्रति दिन एक या दो पैसे कीमत घटाई गई। इसका मतलब साफ है कि तेल कंपनियां भी वही करती हैं जो सरकार चाहती है।

अब चुनाव खत्म हुए हैं इसलिए जितनी ज्यादा हो सके कीमतें बढ़ाकर लोगों की जेब खाली कर ली जाए, उसके बाद साल अंत में जब मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होंगे तो तेल के दामों को फिर थामने या यूं कहें कि गिरता हुआ दिखाने में यही बढ़े हुए दाम ही तो काम आएंगे। हकीकत में देखा जाए तो ऑयल मार्केटिंग कंपनियां कब क्या फैसला लेंगी इसका निर्धारण भी कहीं न कहीं केंद्र के इशारों पर ही हो रहा है। कुल मिलाकर एक आम इंसान सिर्फ पेट्रोल-डीजल के लिए ही भारी भुगतान नहीं करता बल्कि उत्पाद शुल्क के तौर पर भी भारी कीमत उसे चुकाना पड़ती है, इस कारण यह गर्मी जो जिस्म को झुलसाने वाली दिखाई देती है उससे कहीं ज्यादा तो पेट्रोल-डीजल के दामों ने इंसानों को अंदर तक झुलसा के रख दिया है, जिसका खामियाजा केंद्र सरकार को लोकसभा चुनाव के दौरान भुगतना पड़ सकता है। इसलिए समय रहते पेट्रोलियम पदार्थों को भी जीएसटी के दायरे में लाकर इसके दामों को थामने की भरसक कोशिश करनी होगी, अन्यथा चुनाव के समय में तेल कंपनियां जो कि अपनी कमाई नेताओं और पार्टियों के ऊपर लुटा चुकी होंगी भी यही कहती नजर आएंगी कि हम तो डूबे हैं सनम तुमको भी ले डूबेंगे।

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