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पाकिस्तान के बहाने चीन पर निशाना साधता अमेरिका

कहने को तो अमेरिका ने मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद की गिरफ्तारी नहीं होने पर चिंता जाहिर की है, लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। अमेरिका की नजर तो पाकिस्तान में चीन के बढ़ते बर्चस्व पर है, जिसके दम पर पाकिस्तान लगातार आंखें तरेरने का काम कर रहा है। चीन की विस्तारवादी नीति का समर्थक बन रहे पाकिस्तान को वह सिर्फ चेता रहा है, जबकि असल में चीन को कहीं न कहीं अपनी हदों में रहने की बात वह इशारों ही इशारों में करता नजर आ रहा है। गौरतलब है कि शुक्रवार को अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा कि ट्रंप सरकार ने जमात-उद-दावा के सरगना हाफिज सईद पर ईनाम घोषित कर रखा है, लेकिन वह पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहा है।

यह अमेरिका के लिए गंभीर चिंता का विषय है। अब चूंकि यह पहली बार नहीं हुआ है जबकि अमेरिका ने आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान से कुछ कह रहा हो और पाकिस्तान कुछ और करता चला जा रहा हो। इससे पहले यदि याद कमजोर न हो तो अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन कहे जाने वाले ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में ही छुपा कर रखा गया था, लेकिन पाकिस्तानी सरकार समेत खुफिया तंत्र और सुरक्षाबल यही कहते रहे कि लादेन उनके देश में नहीं है। इसके बाद क्या हुआ? अमेरिका की सहयोगी सैन्य टीम ने पाकिस्तान में ही नाटकीय ढंग से ओसामा बिन लादेन का एनकाउंटर किया और दुनिया के सामने यह बताया गया कि लादेन कहीं और नहीं बल्कि पाकिस्तान में ही आराम से रह रहा था। अब यदि अमेरिका चाहता तो इसी बहाने पाकिस्तान की ईंट से ईंट बजा देता, लेकिन ऐसा नहीं किया गया, बल्कि यह कहा गया कि पाकिस्तान भी आतंकवादी पीड़ित देश है।

भारत कहता रहा कि पाकिस्तान आतंकवादियों की फैक्ट्री बन चुका है, लेकिन अमेरिका ने नहीं माना, अब जबकि चीन ने पाकिस्तान को अपने हाथों की कठपुतली बनाने का उपक्रम शुरु कर रखा है तो अमेरिका को चिंता सता रही है कि कहीं उनका सुरक्षित सैन्य ठिकाना चीन न हड़प ले। इसके लिए वह अब हाफिज सईद के बहाने पाकिस्तान को धमकाने का काम कर रहा है। इसी के चलते अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता हेथर नुअर्ट ने हाफिज सईद के खुलेआम पाकिस्तान में घूमने को लेकर चिंता जाहिर की है। अब इस मामले को चीन और उत्तर कोरिया में चल रहे अंदरुनी खेल से जोड़कर देखें तो सारी बात साफ हो जाएगी। दरअसल उत्तर कोरिया प्रमुख किम जोंग उन ने बहुत तेजी में चीन से मिलकर एक ऐसी रणनीति पर काम किया है जिसमें अमेरिका फंसता नजर आता है।

सबसे पहले उसने अपने पड़ोसी मुल्क दक्षिण कोरिया से संबंध बेहतर बनाने की दिशा में प्रभावी कदम उठाए, उसके बाद शिखरवार्ता कर विश्व को चौंकाया, साथ ही अमेरिका से बिना शर्त वार्ता करने की दिशा में आगे बढ़ता दिखा। अब चूंकि उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को सफल बनाने में कहीं न कहीं चीन और पाकिस्तान का हाथ रहा है अत: यदि कुछ होता है तो ये देश उसकी तरफ से जरुर ही खड़े होंगे। अमेरिका जो कि शुरु से उत्तर कोरिया को धमकाने का काम कर रहा है उसे यह सब बर्दाश्त नहीं है, इसलिए उसने चीन को अलग-थलग करने की ठान रखी है। इसके चलते उसने उत्तर कोरिया से जहां वार्ता करने पर रजामंदी दिखाई वहीं उसने पाकिस्तान को ऑंख दिखाने का काम भी कर दिया है।

इस कड़े इशारे को यदि पाक नही समझा तो अमेरिका ड्रोन हमले कर कुछ आतंकी ठिकानों को कथित तौर पर खत्म करने की कार्रवाई भी कर सकता है। इसमें अमेरिका की मदद पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ करेंगे, जिन्होंने मुंबई आतंकी हमले पर पाकिस्तानी आतंकियों के हाथ होने की बात स्वीकारी हुई है।

चूंकि पाकिस्तान पर दबाव बनाना है और चीन को उसकी हदों में रहने का सबक भी देना है तो भारत को मित्र देश तो कहना ही पड़ेगा। इसलिए अमेरिकी सरकार की प्रवक्ता ने कहती सुनी गईं कि 'हमारे मोदी सरकार के साथ बहुत गहरे संबंध हैं, और भारतीय विदेश विभाग के सभी लोगों के साथ भी संबंध अच्छे हैं।' इसका अर्थ यही हुआ कि अब भारत दोस्त है और चूंकि पाकिस्तान में हाफिज सईद खुलेआम घूम रहा है, जिस पर कि अमेरिका ने ईनाम घोषित किया हुआ है तो वह दुश्मन जैसा प्रतीत हो रहा है। अब यहां यह भी बतलाते चलें कि हाफिज सईद को जितना बड़ा बताया जा रहा है वह अमेरिका के लिए उतना बड़ा है नहीं। यह जरुर है कि हाफिज सईद आतंकी संगठन जमात-उद-दावा का चीफ है। वह एक दूसरे आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का सह-संस्थापक भी है, लेकिन लादेन जैसा तो कतई नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन दोनों आतंकी संगठनों द्वारा भारत के विभिन्न हिस्सों में अनेक आतंकी हमले भी करवाए गए हैं। इसलिए भारत हाफिज सईद को आतंकी घोषित कर उसके खिलाफ लगातार सबूत देता आया है, लेकिन पाकिस्तान उसे दरकिनार कर साफ-पाक बताने में लगा रहा है।

यही वजह है कि हाफिज पाकिस्तान में राजनीतिक संगठन बनाने और फिर चुनाव मैदान में उतरने तक का ऐलान कर सका। दूसरी तरफ हाफिज के सिर पर अमेरिका एक करोड़ डॉलर का इनाम घोषित करता है, लेकिन जब उसका भी असर दिखाई नहीं देता तो उसे यह चिंता जाहिर करनी पड़ती है। अब पाकिस्तान के लिए हाफिज सईद गले की फांस साबित हो रहा है, क्योंकि यदि उस पर कार्रवाई की जाती है तो अदालत, सेना और कट्टरपंथी सरकार से नाराज हो जाएंगे, जबकि कार्रवाई नहीं होने पर अमेरिका नाराज होगा। अब यदि बीच का रास्ता निकालना पड़ा तो यही हो सकता है कि पाकिस्तान चीन से बराबर दूरी बनाए और उत्तर कोरिया मामले में भी अपनी नीति स्पष्ट करे, ताकि उस पर दबाव बनाने में अमेरिका सफल हो सके। कुल मिलाकर हाफिज और पाकिस्तान तो बहाना है सही मायने में अमेरिका को चीन पर लगाम लगानी है, जिसकी वह कवायद लगातार कर रहा है।

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