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तेल की खातिर भारत की मुश्किलें बढ़ाता अमेरिका

तेल तो दूर की बात है यहां तो अमेरिका ने तेल की कीमतें तय करने के अधिकार को लेकर एक समय में इराक जैसे देश की कूटनीतिक तौर पर ईंट से ईंट बजाकर रख दी थी। अब वही अमेरिका एक बार फिर तेल को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक चालें चलता दिखाई दे रहा है। इस कारण जहां विश्वस्तर पर खासी उथल-पुथल नजर आ रही है तो वहीं दूसरी तरफ एक के बाद एक चुनौतियां भी दस्तक देती चली जा रही हैं। एक तरफ विश्व स्तर पर अस्थिरता का दौर चल रहा है तो वहीं दूसरी तरफ पश्चिम एशिया के लिए अनेक चुनौतियां खड़ी की जा रही हैं, जिसका असर आज नहीं तो कल भारत को भी घेरेंगी ही घेरेंगी। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अचानक ही ईरान से जुड़ी संयुक्त व्यापक कार्ययोजना जेसीपीओए को एक झटके में खत्म कर दिया। ऐसा करते हुए उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस और यूरोपीय शक्तियों द्वारा चंद खामियों को सही करने के प्रस्ताव की भी परवाह नहीं की।

वैसे यह सब अचानक नहीं हुआ, बल्कि ट्रंप प्रारंभ से ही ईरान को अपने निशाने पर लिए हुए था और यूरोपीय नेता उन्हें समझाने की भरसक कोशिश भी कर चुके थे, लेकिन उन्होंने इस मामले में देखना और सुनने वाला कालम ही खत्म कर दिया था। इसलिए उन्होंने ब्रिटिश विदेश मंत्री बोरिस जॉनसन की दलीलों और सलाह को भी सिरे से खारिज कर दिया। संभवत: ट्रंप यह तय कर चुके हैं कि ईरान मामले में कोई दूसरी योजना बदतर ही साबित होने वाली है, इसलिए उन्हें फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों और जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल भी समझा नहीं पाए। ईरान से परमाणु समझौते को लेकर ट्रंप ने निंदा महज इसलिए की कि मौजूदा समझौता केवल एक तय समय सीमा के लिए ही है।

समझौते में बैलिस्टिक मिसाइलों पर अंकुश लगाने का भी कोई प्रावधान नहीं है। दरअसल ट्रंप की इस राय के पीछे कहीं न कहीं इजरायल का भी हाथ रहा है, जो पहले से ही कुछ गोपनीय परमाणु फाइलों का हवाला देते हुए इसी तरह की बातें कर रहा था। यही नहीं बल्कि इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने तो ईरान पर सीरिया को अत्याधुनिक हथियारों की आपूर्ति करने तक का आरोप लगा दिया था। इन सब के चलते ही ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने ट्रंप को चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर वह तेहरान के साथ परमाणु करार को रद्ध करते हैं तो यह ऐतिहासिक भूल होगी, क्योंकि इसके बाद ईरान और तेजी से परमाणु परीक्षण की ओर कदम बढ़ाएगा। इसके चलते अब ईरान पर आर्थिक प्रतिबंधों का दौर और सख्त किया जा सकता है। जहां तक नेतन्याहू के आरोपों का सवाल है तो ईरान कह चुका है कि ये सब मनगढ़ंत आरोप हैं, जो कि वह पहले से लगाता चला आ रहा है। वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपेओ ने यह कहकर कि इजरायली प्रधानमंत्री द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेज सही और पुख्ता हैं समस्या को और बढ़ाने का काम किया।

अब इसके मद्देनजर विश्व स्तर पर इस फैसले का असर देखा जाए तो मालूम चलता है कि पश्चिमी एशिया और भारत भी इससे अछूता नहीं रहने वाला है। चूंकि विश्व में भारत तेल का आयातकों में तीसरा स्थान रखता है, और ईरान भारत को तेल निर्यात करने वाले देशों में भी तीसरे स्थान पर रहा है अत: ईरान पर कुछ भी होने का मतलब है कि भारत में तेल की आपूर्ति पर असर पड़ना। अब जबकि पहले से ही पेट्रोलियम पदार्थों के दाम आसमान छू रहे हैं, तो अमेरिका जब ईरान पर और पाबंदियां आयद करेगा तो तेल के दाम किस पायदान पर जाकर रुकेंगे कहा नहीं जा सकता है। इसलिए अमेरिका ने ईरान के खिलाफ कदम उठाया तो उसकी धमक भारत में भी जरुर ही सुनी जाएगी। ऐसे में तेल की आवक बराबर बनी रहे इसका हल भी समय रहते खोजा जाना जरुरी हो गया है।

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