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आकर्षण के सिद्धांत सेे समझिए पुल ढहने से आई प्रतिक्रियाओं को

आकर्षण दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है और दुनिया की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण है अर्थात हमारी ताकत ही हमारी कमजोरी है।

फेसबुक की दुनिया में फेसबुक से ही शुरूआत की जानी चाहिए। यहाँ अनेक प्रकार की दीवारें हैं और उन दीवारों में तमाम ऐसी दीवारें है , जो हर रोज ललकारिता हैं और उनकी ललकार में लार टपक टपक कर लाइक कमेंट की लहर दौड़ती दिखती है। आश्चर्य की बात है कि असली और फर्जी के खेल में अश्लील शब्दों का प्रयोग कर सत्ता की हनक हांकने वालों से लेकर सत्ताच्युत लोगों द्वारा खूब लोकप्रियता बटोरी जा रही है और ऐसे लोग अंधे होकर मदमस्त हाथी की तरह दुनिया के सुख चैन को खत्म कर अपना अपना झंडा बुलंद होता महसूस कर रहे हैं। दुनिया के लोगों को समझना होगा कि मानव जीवन कितने खतरे में है। तनिक देर के लिए भारत से मत समझिए , चलिए इजराइल और फिलिस्तीन चलते हैं। जब बात भारत और पाकिस्तान की आती है तो हमारे अंदर की देशभक्ति और तमाम वजहों से हम युद्ध चाहते हैं और युद्ध जायज भी लगता है। किन्तु जब फिलिस्तीन के लोगों पर इजराइल की सेना बम फोड़ती है , तब लगता है कि इतना खून - खराबा ठीक नहीं है और यही खून - खराबा इजराइल के लोगों को अच्छा लगता होगा कि उनके देश की सेना फिलिस्तीन के लोगों को खत्म कर रही है। हालात हमारे ही पड़ोसी देश की तरह हैं या इससे थोड़े बहुत जुदा होगें पर हाँ मृत्यु इंसानों की और इंसानियत की हो रही है , यह एक समान बात है। 

आतंकवाद , नक्सलवाद और राष्ट्रीय सीमाओं व हितों के आधार पर हर मृत्यु जायज हो जाती है। किन्तु जब पश्चिम बंगाल के कलकत्ता में पुल ढह जाता है तो एक दल भगवान की मर्जी से लेकर तमाम वजह गिना देता है तो वहीं दूसरे दल के नेता व समर्थक भ्रष्टाचार और लापरवाही गिना देते हैं। आज जब बनारस में घटना हुई तो पुल का ढहना समान बात है। फर्क इतना सा है कि समय और राज्य व शहर अलग अलग हैं। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि वाराणसी से साँसद पीएम नरेन्द्र मोदी हैं। उत्तर प्रदेश के सीएम भी एक योगी हैं। इन सबके बावजूद भी जिंदगियां हार रही हैं तो समझना होगा कि जिंदगी के प्रति जिम्मेदारी वाले भाव का हर किसी में क्षरण हो चुका है। अफसोस के साथ कहना होगा कि सत्ता की अपनी अलग चाल होती है। शायद सतरंज के मोहरों की निर्धारित हर चाल से जुदा सत्ता और राजनीति की चाल होती है। जहाँ सिर्फ भारत ही नहीं वैश्विक स्तर पर मानवता हार रही है। 

राष्ट्रों की विस्तारवादी नीति और तानाशाहों का घमंड व बाजारवादी सोच से ग्रसित सम्पूर्ण विश्व में मानवता का कत्ल हो रहा है। वजह कुछ भी हो सकती है। सभी देशों का दादा एक ही है वह अमेरिका है। पूरी दुनिया में खून खराबे का खेल खेलने वाला अमेरिका है। फिर उसके बाद सारे घटनाक्रम से राष्ट्र जुड़ते जूझते चले जाते हैं। कुछ यूं सबकुछ हो चुका है कि जंगली जानवर से बदतर आदमी होता जा रहा है। 

कुछ अच्छाई अभी शेष है , उसी सुख में हम जी रहे हैं। किन्तु अच्छे लोगों को अच्छी दुनिया के निर्माण हेतु योगदान देना चाहिए। यह योगदान लेखन , समाजसेवा जैसे क्षेत्र से भी हो सकता है। ईमानदारी से आम आदमी का काम करने वाले अफसर का भी योगदान हो सकता है। हम विचारों का सतत प्रवाह कर के अच्छी दुनिया का निर्माण कर सकते हैं।

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