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शिवसेना और कांग्रेस कह सकते हैं हम साथ साथ हैं

राहुल गांधी का पीएम बनने का बयान और शिवसेना केे बदले बदले सुर भविष्य में बड़े राजनीतिक परिवर्तन की ओर इशारा भी करते हैं। जनेऊधारी राहुल गांधी साफ्ट हिन्दुत्व वाली राजनीति शिवसेना के समर्थन से भी तय कर सकते हैं। यह इतना सरल भी नहीं जितना कि कयास लगाया जा सकता है। इसके अपने वाजिब कारण हैं कि फिर कांग्रेस कितना भी मुस्लिम समाज को विश्वास दिलाए , आवश्यक नहीं कि विश्वास कर पाएं। ऐसा संभव इसलिये भी हो सकता है कि एकमात्र उद्देश्य नरेन्द्र मोदी को रोकने का है और बीजेपी को सबसे बड़े दल के रूप में उभरने से रोकने के लिए मुस्लिम शिवसेना नामक विष पीने को अंदर से मन मसोस कर वाह्य सहर्ष से तैयार हो जाएंं।

यह भी सत्य है कि मुस्लिमों को बीजेपी से ज्यादा शिवसेना खतरनाक महसूस हुई है तो वहीं बीजेपी ने हमेशा तुष्टीकरण ना करते हुए मुस्लिमों को गले लगाने के साथ साथ " सबका साथ सबका विकास " वाला नारा भी दिया। बावजूद इसके मुस्लिमों का एक बड़ा वर्ग भाजपा व संघ से नफरत ही करता है और इस नफरत में विकास की सच्चाई को भी भुला देते हैं। मुस्लिमों का संघ और भाजपा से नफरत करने की वजह बाबरी मस्जिद ही एक मात्र मुद्दा ना होकर इस्लाम सबसे बड़ी वजह है। इधर तीन तलाक और हलाला जैसे मुद्दे समाज के समक्ष आने से काफी किरकिरी भी हुई , जितनी कि कांग्रेस के शासनकाल में मुस्लिमों के ध्वजा वाहकों को कभी महसूस नहीं हुई।

नरेन्द्र मोदी और भाजपा के विरोधी पूर्व लोकसभा चुनाव में जितने थे। उनमें थोड़ा बहुत इजाफा व्यक्तिगत तौर पर हुआ है परंतु यह इतना भी नहीं कहा जा सकता कि कोई बहुत बड़ा नुकसान है। हालाँकि सोशल मीडिया में बीजेपी विरोधी पोस्ट पर लाइक कमेंट का स्तर बढ़ा है और कमेंट तो इसलिए भी ज्यादा हो जाती हैं कि विरोध करने वाले एक नहीं दो चार कमेंट कर कांग्रेस के पक्ष में हवा बनाने की कोशिश में डटे हैं।

सत्य है कि अब तक कोई यह कहने की हिम्मत भी नहीं कर सका कि " कांग्रेस लाओ देश बचाओ "। इतना आत्मविश्वास अब तक कांग्रेस की ओर से दिखा ही नहीं। फिर भी कवायद इस तरह जारी है कि आगामी लोकसभा चुनाव 2014 से ज्यादा दिलचस्प व आक्रामक होगा। शिवसेना के बदलते सुर पंजे का गिटार बनने जैसा महसूस हो रहा है तो संभव है कि इस बार शिवसेना कांग्रेस के पंजे से सुर चलाएगी फिर भी सवाल हिन्दुत्व के पुरोधा स्व. बाल ठाकरे की आत्मा का भी बना रहेगा।

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